भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

ॐ श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली

किष्किन्धाकाण्ड
ऋष्यमूकपर राम
राग केदारा
[ १ ]
भूषन-बसन बिलोकत सियके ।
प्रेम-बिबस मन, कंप पुलक तनु, नीरजनयन नीर भरे पियके ॥१॥
सकुचत कहत, सुमिरि उर उमगत, सील-सनेह-सुगुनगन तियके ।
स्वामि-दसा लखि लखन सखा कपि, पिघले हैं आंच माठ मानो घियके २
सोचत हानि मानि मन, गुनि गुनि, गये निघटि फल सकल सुकियके ।
बरने जामवंत तेहि अवसर, बचन बिबेक बीररस बियके ॥३॥
धीर बीर सुनि समुझि परसपर बल-उपाय उघटत निज हियके ।
तुलसिदास यह समउ कहेतें कबि लागत निपट निठुर जड़ जियके ॥४॥
[ऋष्यमूक पर्वतपर पहुँचनेपर भगवान् रामकी सुग्रीवके साथ
मित्रता हुई । उन्होंने भगवान्‌को सीताजीके वस्त्राभूषण, जिन्हें वे
रावणके साथ आकाशमार्गसे जाते समय ऋष्यमूक पर्वतपर वानरोंको
देखकर डाल गयी थीं, दिखलाये । उस समय] सीताजीके वस्त्र और
आभूषणोंको देखते ही भगवान्‌का मन प्रेमसे अधीर हो गया,
गी० १९-
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