भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 296

गीतावली २६० शरीरमें कम्प और पुलकावली छा गयी तथा नेत्रकमलोंमें जल भर आया ॥ १ ॥ सीताजीके शील, स्नेह और शुभ गुणोंको कहनेमें तो प्रभु सकुचाते हैं, परन्तु उनकी याद आनेसे हृदय उमड़ रहा है। स्वामीकी यह दशा देख लक्ष्मणजी, सखा सुग्रीव तथा अन्य वानरगण इस प्रकार द्रवीभूत हो गये, जैसे अग्निका संयोग पाकर घीके मटके चूने लगते हैं ॥ २ ॥ सीताजीके गुणोंको मन-ही-मन सोचकर, उनके वियोगसे बड़ी हानि मान वे शोक करते हैं, मानो उनके समस्त पुण्यफल समाप्त हो गये। उस समय जाम्बवान्‌ने विवेक और वीरता दोनोंसे सने हुए वचन कहे ॥ ३ ॥ उन्हें सुन और समझकर उन धीर-वीरोंने आपसमें अपने बल और हृदयमें सोचे हुए उपाय प्रकट किये। तुलसीदास कहते हैं, उस समयका वर्णन करनेसे कवि हृदयके सर्वथा निठुर और जड़ जान पड़ते हैं ॥४॥ सीताजीकी खोजका आदेव [ २ ] प्रभु कपि-नायक बोलि कह्यो है। बरषा गई, सरद आई, अब लगि नहि सिय-सोधु लह्यो है ॥ १ ॥ जा कारन तजि लोकलाज, तनु राखि बियोग सह्यो है। ताको तौ कपिराज आज, लगि कछु न काज निबह्यो है ॥ २ ॥ सुनि सुग्रीव सभीत नमित-मुख, उतरु न देन चह्यो है। आइ गए हरि जूथ, देखि उर पूरि प्रमोद रह्यो है ॥ ३ ॥ पठये बदि बदि अवधि दसहु दिसि, चले बलु सबनि गह्यो है। तुलसी सिय लगि भव-दधिनिधि मनु फिर हरि चहत मह्यो है ॥ ४ ॥ प्रभुने वानरराज सुग्रीवको बुलाकर कहा—'भाई ! वर्षा ऋतु बीत गयी और शरद् ऋतु भी आ गयी, किन्तु अभीतक तुमने