गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६१ सुन्दरकाण्ड सीताकी कोई खोज नहीं की ॥ १ ॥ जिसके लिये मैंने लोकसज्जाको त्यागकर, शरीरको जीवित रख यह वियोग सहन किया है, हे कपिराज ! उसका आजतक तुमने कोई भी काम पूरा नहीं किया ॥ २ ॥ यह सुन सुग्रीवने भयभीत हो अपना मुख नीचा कर लिया और उसे कुछ भी उत्तर देनेका साहस न हुआ, इतने- हीमें किष्किन्धा नगरमें वानरोंके बहुत-से यूथ आ गये, जिन्हें देखकर सर्वत्र आनन्द छा गया ॥ ३ ॥ उन सबको लौटनेकी अवधि निश्चित कर दशों दिशाओंमें भेजा गया और उन सबने भी इस कार्य के लिये हृदयमें बल धारण किया। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो भगवान् सीताजीके लिये एक बार फिर संसारसमुद्रको मथना चाहते हैं ॥ ४ ॥ —**— सुन्दरकाण्ड अशोकवनमें हनूमान् राग केदारा [ १ ] रजायसु रामको जब पायो । गाल मेलि मुद्रिका, मुदित मन पवनपूत सिर नायो ॥ १ ॥