भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 293

२८७ अरण्यकाण्ड बालक सुमित्रा कौसिलाके पाहुने फल-सागके । सुनि समुझि तुलसी जानु रामहि बस अमल अनुरागके ॥ ६ ॥ इस समय देवतालोग पुष्प बरसाकर प्रसन्न हो रहे हैं और मुनिजन प्रसन्नचित्तसे प्रशंसा करते हुए आनन्दित होते हैं कि 'आज कैसी रुचि और कैसी क्षुधासे लक्ष्मणजीके सहित भगवान् राम माँग- माँगकर फल खा रहे हैं ! प्रभु राम तो सम्पूर्ण यज्ञोंके भोक्ता हैं, सो फल खाते हैं और माँग रहे हैं तथा शबरी भी बराबर दे रही हैं'—इस प्रकार बड़े भाग्यशाली शिव और सनकादि सिद्धगण पुलकित होकर शबरीकी प्रशंसा करते हैं । अहा ! माता कौसल्या और सुमित्राके पुत्र [जो तरह-तरहके व्यञ्जनोंका भोग लगानेवाले हैं] आज फल और शाकके मेहमान हैं ! तुलसीदास कहते हैं, यह सुन और समझकर तू यह निश्चय जान कि भगवान् राम एकमात्र निर्मल प्रेमके अधीन हैं ॥ ६ ॥ रघुबर अँचइ उठे, सबरी करि प्रनाम कर जोरि । हौं बलि बलि गई, पुरई मंजु मनोरथ मोरि ॥ पुरई मनोरथ स्वारथहु परमारथहु पूरन करी । अघ-अवगुनन्हिकी कोठरी करि कृपा मुद मंगल भरी ॥ तापस-किरातिनि-कोल मृदु मूरति मनोहर मन घरी । सिर नाइ, आयसु पाइ गवने, परमनिधि पाले परी ॥ ७ ॥ [इस प्रकार भोजन करनेके अनन्तर] प्रभु आचमन करके उठे । तब शबरीने प्रणाम कर हाथ जोड़कर कहा—'मैं बलि-बलि जाती हूँ, आज आपने मेरी प्रिय कामना पूरी कर दी । आपने मेरा