गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६३ सुन्दरकाण्ड कृस सरीर सुभाय सोभित, लगी उड़ि उड़ि धूलि । मनहु मनसिज मोहनी-मनि गयो भोरे भूलि ॥ २ ॥ रटति निसिबासर निरंतर राम राजिवनैन । जात निकट न बिरहिनी-अरि अकनि ताते बैन ॥ ३ ॥ नाथके गुनगाथ कहि कपि दई मुंदरी डारि । कथा सुनि उठि लई कर बर, रुचिर नाम निहारि ॥ ४ ॥ हृदय हरष-बिषाद अति पति-मुद्रिका पहिचानि । दास तुलसी दसा सो केहि भाँति कहै बखानि ? ॥ ५ ॥ जिस समय परमधीर हनुमान्जीने लङ्कामें पहुँचकर सीताजी- को देखा, उस समय उनके हृदयमें प्रेम नहीं समाता था ॥ १ ॥ उनका कृश शरीर स्वभावसे ही शोभायमान था, उसपर उड़-उड़कर धूल जम गयी थी, वे ऐसी जान पड़ती थीं, मानो कामदेव भूलसे अपनी मोहनी मणिको भूल गया हो ॥ २ ॥ वे रात-दिन निरन्तर कमलनयन भगवान् रामका नाम ही रट रही थीं । उनके उन शोक- संतप्त वचनोंको सुनकर विरहिणी स्त्रियोंका शत्रु [ शीतल-मन्द- सुगन्ध पवन ] उनके पास नहीं जाता था [ क्योंकि उसे स्वयं उस विरहाग्निमें दग्ध हो जानेका भय था ] ॥ ३ ॥ यह देख हनुमान्जी- ने प्रभु रामकी गुणगाथा कहते हुए वह मुद्रिका डाल दी । सीताजी- ने वह कथा सुनकर और उसपर भगवान्का मनोहर नाम देखकर वह मुद्रिका अपने सुन्दर हाथमें उठा ली ॥ ४ ॥ पतिकी मुद्रिकाको पहचानकर उनके हृदयमें बड़ा ही हर्ष और विषाद हुआ* । उस दशाका तुलसीदास किस प्रकार वर्णन कर सकता है ॥ ५ ॥ *प्रियतमकी वस्तु मिली—इससे तो हर्ष हुआ; परन्तु यह सोचकर कि यह यहाँ कैसे आयी, कोई अनिष्ट तो नहीं हो गया—दुःख हुआ ।