भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 300

गीतावली २६४ राग सोरठ [ ३ ] बोलि, बलि, मूँदरी ! सानुज कुसल कोसलपालु । अमिय-बचन सुनाइ मेटहि बिरह-ज्वाला-जालु ॥ १ ॥ कहत हित अपमान मैं कियो, होत हिय सोइ सालु । रोष छमि सुधि करत कबहु ललित लछिमन लालु ॥ २ ॥ परस्पर पति-देवरहि का होति चरचा चालु । देवि ! कहु केहि हेत बोले बिपुल बानर-भालु ॥ ३ ॥ सीलनिधि समरथ सुसाहिब दीनबंधु दयालु । दास तुलसी प्रभुहि काहु न कह्यो मेरो हालु ॥ ४ ॥ [वे कहने लगीं—] 'अरी मुद्रिके ! मैं बलिहारी जाऊँ, बता तो क्या भाईसहित कृपालु कोसलनाथ कुशलसे हैं ? तू अमृतमय वचन सुनाकर मेरी विरहजनित ज्वालामालाओंको शान्त कर दे ॥१॥ हाय ! हितकी कहते हुए भी मैंने लक्ष्मणजीका तिरस्कार किया— मेरे हृदयमें अभीतक इसका खेद बना हुआ है ! वे ललित लखन- लाल अपने रोषको शान्त कर क्या कभी मेरी सुधि करते हैं ? ॥२॥ पतिदेव और देवरजीमें आजकल किस विषयकी चर्चा चला करती है ? देवि ! बता तो, उन्होंने बहुत-से रीछ-वानर किसलिये बुलाये हैं ? ॥ ३ ॥ अरी मुद्रिके ! प्रभु तो शीलके भण्डार, सब प्रकार समर्थ, सच्चे स्वामी, दीनबन्धु और परम दयालु हैं । मालूम होता है, अभी प्रभुको किसीने मेरा समाचार नहीं सुनाया [ इसलिये उनके आनेमें इतना विलम्ब हुआ है ]' ॥ ४ ॥