गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २८२ मेरे मरिबे सम न चारि फल, होंहि तौ, क्यों न कहीजें ? तुलसी प्रभु दियो उतरु मौन हीं, परी मानो प्रेम सहीजें ॥ ४ ॥ [भगवान् राम कहते हैं—] 'हे तात ! मेरे विचारसे तो आप कुछ दिन और जीवित रहिये। आप अपने इस पुत्रकी सेवाका सुख देखिये और मुझे पिताका आनन्द दीजिये ॥ १ ॥ अब विधाता आपपर प्रसन्न हैं; अतः आप दिव्यदेह और संसारमें इच्छाजीवन माँग लीजिये तथा भगवान् विष्णु और शंकरका सुयश सुनाकर अपना दर्शन देते हुए लोगोंको कृतार्थ कीजिये' ॥ २ ॥ तब पक्षिराज भगवान्के मुखकी ओर देखकर उनके अमृतमय वचन सुन तथा शरीरको रामके नयनजलसे भीगा जान हँसकर बोले—'रघुनाथजी! मैं बलिहारी जाऊँ ! आप विश्वास कीजिये, मैं स्वभावसे ही कहता हूँ ॥ ३ ॥ मेरे मरनेके समान तो चारों फल भी नहीं हैं और यदि हों तो बतलाइये।' तुलसीदासजी कहते हैं, इसका उत्तर भगवान्ने मौन ही दिया, इससे मानो गृध्रराजके प्रेमपर सही पड़ गयी ॥ ४ ॥ [ १६ ] मेरो सुनियो, तात ! संदेसो । सीय-हरन जनि कहेहु पितासों, ह्वैहै अधिक अँदेसो ॥ १ ॥ रावरे पुन्यप्रताप-अनल महँ अकप दिननि रिपु दहिहैं। कुलसमेत सुरसभा दसानन समाचार सब कहिहैं ॥ २ ॥ सुनि प्रभु-बचन, राखि उर मूरति, चरन-कमल सिर नाई। चल्यो नभ सुनत राम-कल-कीरति, अरु निज भाग बड़ाई ॥ ३ ॥ पितु-ज्यों गीध-क्रिया करि रघुपति अपने धाम पठायो । ऐसो प्रभु बिसारि तुलसी सठ ! तू चाहत सुख पायो ॥ ४ ॥