भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 288

गीतावली २८२ मेरे मरिबे सम न चारि फल, होंहि तौ, क्यों न कहीजें ? तुलसी प्रभु दियो उतरु मौन हीं, परी मानो प्रेम सहीजें ॥ ४ ॥ [भगवान् राम कहते हैं—] 'हे तात ! मेरे विचारसे तो आप कुछ दिन और जीवित रहिये। आप अपने इस पुत्रकी सेवाका सुख देखिये और मुझे पिताका आनन्द दीजिये ॥ १ ॥ अब विधाता आपपर प्रसन्न हैं; अतः आप दिव्यदेह और संसारमें इच्छाजीवन माँग लीजिये तथा भगवान् विष्णु और शंकरका सुयश सुनाकर अपना दर्शन देते हुए लोगोंको कृतार्थ कीजिये' ॥ २ ॥ तब पक्षिराज भगवान्‌के मुखकी ओर देखकर उनके अमृतमय वचन सुन तथा शरीरको रामके नयनजलसे भीगा जान हँसकर बोले—'रघुनाथजी! मैं बलिहारी जाऊँ ! आप विश्वास कीजिये, मैं स्वभावसे ही कहता हूँ ॥ ३ ॥ मेरे मरनेके समान तो चारों फल भी नहीं हैं और यदि हों तो बतलाइये।' तुलसीदासजी कहते हैं, इसका उत्तर भगवान्‌ने मौन ही दिया, इससे मानो गृध्रराजके प्रेमपर सही पड़ गयी ॥ ४ ॥ [ १६ ] मेरो सुनियो, तात ! संदेसो । सीय-हरन जनि कहेहु पितासों, ह्वैहै अधिक अँदेसो ॥ १ ॥ रावरे पुन्यप्रताप-अनल महँ अकप दिननि रिपु दहिहैं। कुलसमेत सुरसभा दसानन समाचार सब कहिहैं ॥ २ ॥ सुनि प्रभु-बचन, राखि उर मूरति, चरन-कमल सिर नाई। चल्यो नभ सुनत राम-कल-कीरति, अरु निज भाग बड़ाई ॥ ३ ॥ पितु-ज्यों गीध-क्रिया करि रघुपति अपने धाम पठायो । ऐसो प्रभु बिसारि तुलसी सठ ! तू चाहत सुख पायो ॥ ४ ॥