गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७३ अरण्यकाण्ड है ? तुलसीदास तो प्रभुकी श्रवणसुखदायिनी, संसारसरिन्नित्तारिणी पवित्र कीर्तिका ही गान करता है ॥ ५ ॥ राग सोरठा [ ६ ] रघुबर दूरि जाइ मृग मारयो । लखन पुकारि, राम हरुए कहि, मरतहु बैर सँभारयो ॥ १ ॥ सुनहु तात ! कोउ तुम्हहि पुकारत प्राननाथको नाईं । कह्यो लषन, हत्यो हरिन, कोपि सिय हठि पठयो बरि आईँ ॥ २ ॥ बंधु बिलोकि कहत तुलसी प्रभु 'भाई ! भली न कीन्हीं । मेरे जान जानकी काहू खल छल करि हरि लीन्हीं' ॥ ३ ॥ रघुनाथजीने बड़ी दूर जाकर उस मृगका वध किया। उसने 'हा लक्ष्मण !' ऐसा जोरसे पुकारकर, धीरेसे 'राम' कहा और इस प्रकार मरते समय भी अपनी पूर्व-शत्रुताको याद रक्खा ॥ १ ॥ [तब सीताजीने कहा-] 'लक्ष्मण ! सुनो, तुम्हें प्राणनाथ प्रभु रामके समान कोई पुकार रहा है।' तब लक्ष्मणजीने कहा- 'कुछ नहीं, हरिण मारा गया है।' इसपर सीताजीने कुपित होकर उन्हें हठपूर्वक बलात् भेज दिया ॥ २ ॥ उस समय भाईको आता देख तुलसीदास- के प्रभु भगवान् राम कहने लगे- 'भैया ! तुमने अच्छा नहीं किया; मेरे विचारसे तो किसी दुष्टने इस प्रकार छल करके जानकीको हर लिया है' ॥ ३ ॥ सीता-हरण [ ७ ] आरत बचन कहति बैदेही । बिलपति भूरि बिसूरि 'दूरि गए मृग सँग परम सनेही ॥ १ ॥ गी० १८-