भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 280

कहे कटु बचन, रेख नाँघी मैं, तात छमा सो कीजै। देखि बधिक-बस राजमरालिनि, लषनलाल ! छिनि लीजै ॥ २ ॥ बनदेवनि सिय कहन कहति यों छल करि नीच हरी हौं। गोमर-कर सुरधेनु, नाथ ! ज्यों त्यों पर-हाथ परी हौं ॥ ३ ॥ तुलसिदास रघुनाथ-नाम-धुनि अकनि गीध धुनि धायो। 'पुत्रि पुत्रि ! जनि डरहि, न जैहै नीचु, मीचु हौं आयो' ॥ ४ ॥ [लक्ष्मणजीके चले जानेपर रावण यतिवेष धारण कर पञ्चवटी- में आया और भिक्षाके मिससे सीताजीको पास बुला, उन्हें रथपर बिठाकर ले चला।] उस समय सीताजी आर्त वचन कहने लगीं और 'हाय ! परमप्रिय भगवान् राम मृगके साथ न जाने कितनी दूर निकल गये' ऐसा कहकर बहुत दुःख करके रोने लगीं ॥ १ ॥ 'लषणलाल ! मैंने तुमसे कठोर वचन कहे और तुम्हारी खींची हुई रेखाको लाँघा, सो हे तात ! तुम क्षमा करो और इस समय इस राजहंसीको बधिकके हाथमें पड़ी देखकर उससे छीन लो' ॥ २ ॥ फिर वनदेवताओंसे वे इस प्रकार संदेशा कहने लगीं-[तुम भगवान् रामसे कहना कि ] 'मुझे नीच रावणने छल करके हर लिया है। हे नाथ ! कसाईके हाथ जैसे कामधेनु पड़ जाय, उसी प्रकार इस समय मैं शत्रुके हाथमें पड़ गयी हूँ' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समय सीताजीके मुखसे रघुनाथजीके नामकी ध्वनि सुनकर गृध्रराज क्रुद्ध होकर दौड़ा और बोला-'बेटी! डर मत। अब यह नीच बचकर नहीं जा सकता, उसका कालरूप मैं आ गया हूँ' ॥ ४ ॥ जटायु-वध [ ८ ] फिरत न बारहि बार प्रचारचो। चपरि चोंच-चंगुल हय हति, रथ खंड खंड करि डारचो ॥ १ ॥