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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

कहे कटु बचन, रेख नाँघी मैं, तात छमा सो कीजै। देखि बधिक-बस राजमरालिनि, लषनलाल ! छिनि लीजै ॥ २ ॥ बनदेवनि सिय कहन कहति यों छल करि नीच हरी हौं। गोमर-कर सुरधेनु, नाथ ! ज्यों त्यों पर-हाथ परी हौं ॥ ३ ॥ तुलसिदास रघुनाथ-नाम-धुनि अकनि गीध धुनि धायो। 'पुत्रि पुत्रि ! जनि डरहि, न जैहै नीचु, मीचु हौं आयो' ॥ ४ ॥ [लक्ष्मणजीके चले जानेपर रावण यतिवेष धारण कर पञ्चवटी- में आया और भिक्षाके मिससे सीताजीको पास बुला, उन्हें रथपर बिठाकर ले चला।] उस समय सीताजी आर्त वचन कहने लगीं और 'हाय ! परमप्रिय भगवान् राम मृगके साथ न जाने कितनी दूर निकल गये' ऐसा कहकर बहुत दुःख करके रोने लगीं ॥ १ ॥ 'लषणलाल ! मैंने तुमसे कठोर वचन कहे और तुम्हारी खींची हुई रेखाको लाँघा, सो हे तात ! तुम क्षमा करो और इस समय इस राजहंसीको बधिकके हाथमें पड़ी देखकर उससे छीन लो' ॥ २ ॥ फिर वनदेवताओंसे वे इस प्रकार संदेशा कहने लगीं-[तुम भगवान् रामसे कहना कि ] 'मुझे नीच रावणने छल करके हर लिया है। हे नाथ ! कसाईके हाथ जैसे कामधेनु पड़ जाय, उसी प्रकार इस समय मैं शत्रुके हाथमें पड़ गयी हूँ' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समय सीताजीके मुखसे रघुनाथजीके नामकी ध्वनि सुनकर गृध्रराज क्रुद्ध होकर दौड़ा और बोला-'बेटी! डर मत। अब यह नीच बचकर नहीं जा सकता, उसका कालरूप मैं आ गया हूँ' ॥ ४ ॥ जटायु-वध [ ८ ] फिरत न बारहि बार प्रचारचो। चपरि चोंच-चंगुल हय हति, रथ खंड खंड करि डारचो ॥ १ ॥

२७५ अरण्यकाण्ड बिरथ बिकल कियो, छीन लीन्हि सिय, घन घायनि अकुलान्यो ॥ तब असि काढ़ि, काटि पर पाँवर लै प्रभु-प्रिया परान्यो ॥ २ ॥ रामकाज खगराज आजु लरचो, जियत न जानकि त्यागी ॥ तुलसिदास सुर-सिद्ध सराहत, धन्य बिहँग बड़भागी ॥ ३ ॥ जटायुने रावणको बारम्बार फटकारा, परन्तु वह पीछे नहीं फिरा, तब उसने बड़ी फुर्तीसे चोंच और पंजोंसे घोड़ोंको मारकर रथके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ १ ॥ फिर रावणको रथहीन करके व्याकुल कर दिया और सीताजीको छीन लिया। तब नीच रावणने बहुत-से घावोंसे व्यथित हो तलवार निकालकर उसके पंख काट डाले और प्रभुकी प्राणप्रिया सीताजीको लेकर चल दिया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय देवता और सिद्धगण जटायुकी प्रशंसा करने लगे कि देखो, आज रामकार्यके लिये पक्षिराजने रावणसे युद्ध किया और जीते-जी जानकीको नहीं छोड़ा। बड़भागी जटायु धन्य हैं ॥ ३ ॥ रामकी वियोग-व्यथा राग गौरी [ ९ ] हेमको हरिन हनि फिरे रघुकुल-मनि, लषन ललित कर लिये मृगछाल ॥ आश्रम आवत चले, सगुन न भए भले, फरके बाम बाहु, लोचन बिसाल ॥ १ ॥ सरित-जल मलिन, सरनि सूखे नलिन, अलि न गुंजत, कल कूजें न मराल ॥

गीतावली २७६ कोलिनि-कोल-किरात जहां तहां बिलखात, बन न बिलोकि जात खग-मृग-माल ॥ २ ॥ तरु जे जानकी लाए, ज्याये हरि-करि-कपि, हेरें न हुँकरि, झरें फल न रसाल । जे सुक-सारिका पाले, मातु ज्यों ललकि लाले, तेऊ न पढ़त, न पढ़ावैं मुनिबाल ॥ ३ ॥ समुझि सहमे सुठि, प्रिया तौ न आई उठि, तुलसी बिबरन परन-तृन-साल । औरै सो सब समाजु, कुसल न देखौं आजु, गहबर हिय कहैं कोसलपाल ॥ ४ ॥ इतनेहीमें रघुवंशमणि भगवान् राम कनकमृगको मारकर लौटे। लक्ष्मणजी अपने हाथमें उसकी मनोहर मृगछाला लिये हुए थे। आश्रमको आते समय उन्हें अच्छे शकुन नहीं हुए। उनकी वाम भुजा और विशाल नयन फड़क रहे थे ॥ १ ॥ नदियोंका जल मैला दिखायी देता था। कमल तालाबोंमें भी सूख रहे थे, भ्रमर गुंजार नहीं करते थे और हंस मनोहर शब्द नहीं करते थे। किरात, कोल और कोलिनी जहां-तहां बिलख रहे थे, वनके पक्षी और मृगसमूहकी ओर देखा नहीं जाता था ॥ २ ॥ जानकीजीने जिन वृक्षोंको लगवाया था, वे रसीले फल नहीं देते थे और जिन सिंह, हाथी और वानरोंका उन्होंने पोषण किया था, वे हुंकार भरकर देखते नहीं थे । जिन शुक और सारिकाओंको सीताजीने पाला था और माताके समान बड़े चावसे जिन्हें लाड़ लड़ाया था, वे भी इस समय पढ़ते नहीं थे और न मुनि- बालिकाएँ उन्हें पढ़ाती ही थीं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जब

२७७ अरण्यकाण्ड कोसलपाल प्रभु रामने देखा कि प्राणप्रिया सीताजी स्वागत करनेके लिये नहीं आयीं और पर्णकुटी भी विवरण (कान्तिहीन) जान पड़ती है तो वे सब रहस्य जानकर सहम गये और विह्वलहृदयसे कहने लगे—'आज सारा समाज और ही तरहका हो रहा है, मुझे कुशल नहीं जान पड़ती' ॥ ३ ॥ [ १० ] आश्रम निरखि भूले, द्रुम न फले न फूले, अलि-खग-मृग मानो कबहुँ न हे। मुनि न मुनिबधूटी, उजरी परनकुटी, पंचबटी पहिचानि ठाढ़ेइ रहे ॥ १ ॥ उठी न सलिल लिए, प्रेम मुदित हिए, प्रिया न पुलकि प्रिय बचन कहे। पल्लव-सालन हेरी, प्रानबलभा न टेरी, बिरह बिथकि लखि लषन गहे ॥ २ ॥ देखे रघुपति-गति बिबुध बिकल अति, तुलसी गहन बिनु दहन बहे। अनुज दियो भरोसो, तौलौँहै सोचु खरो सो, सिय-समाचार प्रभु जौलौं न लहे ॥ ३ ॥ वे आश्रमको देखकर भी भूल गये, क्योंकि वहाँके वृक्ष न फूले हैं, न फले हैं। भौंरे, पक्षी और मृग तो मानो वहाँ कभी थे ही नहीं; इसके सिवा न वहाँ मुनि थे और न मुनिपत्नियाँ ही। पर्णकुटी भी उजड़ी पड़ी थी। भगवान् पञ्चवटीको पहचानकर खड़े ही रह गये ॥ १ ॥ वे कहने लगे—'आज प्राणप्रिय प्रसन्नचित्तसे जल लेकर नहीं उठी और न उसने कोई प्रिय वचन ही कहे, [और दिकको

गीतावली २७८ तरह] आज पत्तोंके झरोखोंमेंसे देखकर उसने आवाज भी नहीं दी।' इस प्रकार विरह-व्यथासे थकित देखकर उन्हें लक्ष्मणजीने पकड़ लिया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, रघुनाथजीकी ऐसी दशा देखकर देवतालोग बड़े व्याकुल हो गये और वन अग्निके बिना ही दग्धसे हो गये। तब भाई लक्ष्मणने उन्हें भरोसा दिया कि जबतक प्रभुको सीताजीका समाचार नहीं मिलता तभीतक यह शोक खड़ा- सा रहेगा॥ ३ ॥ राग सोरठ [ ११ ] जबहिं सिय-सुधि सब सुरनि सुनाई। भए सुनि सजग, बिरहसरि पैरत थके थाह-सी पाई ॥ १ ॥ कसि तुनीर-तीर धनु-धर-धुर धीर बीर दोउ भाई। पंचबटी-गोदहि प्रनाम करि, कुटी दाहिनी लाई ॥ २ ॥ चले बूझत बन-बेलि-बिटप, खग-मृग, अलि-अवलि सुहाई। प्रभुकी दसा सो समौ कहिबे को कबि उर आह न आई ॥ ३ ॥ रटनि अकनि पहिचानि गीध फिरे करुनामय रघुराई। तुलसीदासहि प्रिया बिसरि गईं, सुमिरि सनेह-सगाई ॥ ४ ॥ जिस समय देवताओंने सीताकी सारी सुधि कही, उस समय भगवान् उसे सुनकर सचेत हो गये। वे विरहरूप नदीमें तैर रहे थे, सो तैरते-तैरते इस समय उन्हें कुछ सहारा-सा मिल गया ॥ १ ॥ तब धनुर्धरोंमें धुरन्धर दोनों धीर-वीर भाई तीर और तरकस कस, पञ्चवटी और गोदावरीको प्रणाम कर कुटीकी प्रदक्षिणा कर वनके लता, वृक्ष, पक्षी, मृग और सुन्दर भ्रमरनिकरसे पूछते हुए आगे चले।

२७९ : अरण्यकाण्ड उस समयकी प्रभुकी दशाका वर्णन करनेको कविके हृदयमें हिम्मत ही नहीं रही [अर्थात् वे भी शोकके कारण अवाक् रह गये] ॥२-३॥ इतनेमें ही राम-नामकी रटन सुन गृध्रराजको पहचानकर करुणामय प्रभु लौटे। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय जटायुका प्रेम-सम्बन्ध याद आनेसे भगवान् रामको प्रियाका भी स्मरण नहीं रहा ॥४॥ जटायुसे भेंट [१२] मेरे एकौ हाथ न लागी। गयो बपु बीति बादि कानन, ज्यों कल्पलता दव दागी ॥१॥ दसरथसों न प्रेम प्रतिपाल्यो, हुतो जो सकल जग साखी। बरबस हरत निसाचर पतिसों हठि न जानकी राखी ॥२॥ मरत न मैं रघुबीर बिलोके तापस बेष बनाए। चाहत चलन प्रान पाँवर बिनु सिय-सुधि प्रभुहि सुनाए ॥३॥ बारबार कर मीजि, सीस धुनि गीधराज पछिताई। तुलसी प्रभु कृपालु तेहि औसर आइ गए दोउ भाई ॥४॥ [गृध्रराज मन-ही-मन पश्चात्ताप कर रहे हैं] 'हाय ! मेरे हाथ एक भी बात नहीं लगी। सिज प्रकार वनमें कल्पलता—किसीके काम न आकर—दावानलसे दग्ध हो जाय, उसी प्रकार मेरा शरीर भी यों ही समाप्त हो गया ॥ १ ॥ दशरथजीसे हमारा प्रेम था— इसको सारा जगत् जानता है, किन्तु मैं उसे भी नहीं निभा सका, क्योंकि जिस समय राक्षसराज सीताको हरे लिये जाता था, उस समय मैं उसे बलपूर्वक रोक न सका ॥ २ ॥ मरनेके समय भी मैं मुनिवेष- धारी रामको न देख सका; अब प्रभुको सीताजीकी सुधि सुनाये बिना

ही ये पामर प्राण प्रयाण करना चाहते हैं' ॥ ३ ॥ इस प्रकार गृध्रराज बारम्बार हाथ मल सीस धुन-धुनकर पछताते हैं। इसी समय तुलसीदासके प्रभु दोनों कृपालु भाई वहाँ आ गये ॥ ४ ॥ [ १३ ] राघौ गीध गोद करि लीन्हों। नयन-सरोज सनेह-सलिल सुचि मनहु अरघजल दीन्हों ॥ १ ॥ सुनहु, लषन ! खगपतिहि मिले बन मैं पितु-मरन न जान्यौ। सहि न सक्यौ सो कठिन बिधाता, बड़ो पछु आजुहि भान्यौ ॥ २ ॥ बहु बिधि राम कह्यौ तनु राखन, परम धीर नहिं डोल्यौ। रोकि प्रेम, अवलोकि बदन-'वधु, बचन मनोहर बोल्यौ ॥ ३ ॥ तुलसी प्रभु झूठे जीवन लगि समय न धोखो लैहों। जाको नाम मरत मुनि दुरलभ तुमहिं कहाँ पुनि पैहों ? ॥ ४ ॥ रघुनाथजीने गृध्रको गोदमें उठा लिया और अपने नयनकमल- द्वारा सनेहरूप पवित्र जलसे मानो अर्घ्यदान किया ॥ १ ॥ फिर कहने लगे—'लक्ष्मण ! सुनो, वनमें पक्षिराजसे मिल लेनेपर मुझे पिताजीका मरना याद ही नहीं आया। परन्तु कुटिल विधाता मेरे इस सुखको सहन नहीं कर सका; इसीसे आज उसने यह बड़ा प्रबल पक्ष नष्ट कर दिया' ॥ २ ॥ फिर रघुनाथजीने जटायुसे शरीर रखने- के लिये बहुत प्रकारसे कहा; परन्तु वह परम धीर अपने निश्चयसे विचलित नहीं हुआ और अपने प्रेमको रोक, प्रभुका मुखचन्द्र देख- कर ये मनोहर वचन बोला—॥ ३ ॥ 'हे प्रभो ! इस समय झूठे जीवनके लिये मैं धोखा नहीं खाऊँगा। भला, जिनका नाम मरते समय मुनियोंको भी दुर्लभ है उन आपको मैं फिर कहाँ पाऊँगा' ॥४॥

२८१ अरण्यकाण्ड [ १४ ] नीके कै जानत राम हियो हौं। प्रनतपाल, सेवक-कृपालु-चित, पितु-पटतरहि दियो हौं ॥ १ ॥ त्रिजगजोनि-गत गीध, जनम भरि खाइ कुजंतु जियो हौं । महाराज सुकृती-समाज सब-ऊपर आजु कियो हौं ॥ २ ॥ श्रवन, बचन, मुख नाम, रूप चख, राम उछंग लियो हौं । तुलसी मो समान बड़भागी को कह सके बियो हौं ॥ ३ ॥ 'हे राम ! मैं आपके हृदयको अच्छी तरह जानता हूँ। आप शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले और सेवकोंपर कृपालु हैं। इसीलिये मुझे पिताकी तुलना दी है ॥ १ ॥ मैं तिर्यक् योनिके अन्तर्गत गीध जातिमें उत्पन्न हुआ और बहुत-से नीच जन्तुओंको खाकर जगत्में जीवित रहा; उसे महाराज ! आज आपने पुण्यात्माओंके समाजमें सबसे ऊपर कर दिया ! ॥ २ ॥ अहा ! मैं कानोंसे आपके वचन सुन रहा हूँ; मुखसे नाम ले रहा हूँ; नेत्रोंसे रूप निहार रहा हूँ और मुझे आपने स्वयं अपनी गोदमें ले रखा है। फिर बतलाइये, दूसरा ऐसा कौन है जो अपनेको मेरे समान बड़भागी बतला सके ?' ॥ ३ ॥ [ १५ ] मेरे जान तात ! कछू दिन जीजै । देखिय आपु सुवन-सेवासुख, मोहि पितुको सुख दीजै ॥ १ ॥ दिब्य-देह, इच्छा-जीवन जग बिधि मनाइ माँगि लीजै । हरि-हर-सुजस सुनाइ, दरस दै, लोग कृतारथ कीजै ॥ २ ॥ देखि बदन, सुनि बचन, अमिय, तन रामनयन-जल भीजै । बोल्यो बिहग बिहँसि रघुबर ! बलि, कहौं सुभाय, पतीजै ॥ ३ ॥

गीतावली २८२ मेरे मरिबे सम न चारि फल, होंहि तौ, क्यों न कहीजें ? तुलसी प्रभु दियो उतरु मौन हीं, परी मानो प्रेम सहीजें ॥ ४ ॥ [भगवान् राम कहते हैं—] 'हे तात ! मेरे विचारसे तो आप कुछ दिन और जीवित रहिये। आप अपने इस पुत्रकी सेवाका सुख देखिये और मुझे पिताका आनन्द दीजिये ॥ १ ॥ अब विधाता आपपर प्रसन्न हैं; अतः आप दिव्यदेह और संसारमें इच्छाजीवन माँग लीजिये तथा भगवान् विष्णु और शंकरका सुयश सुनाकर अपना दर्शन देते हुए लोगोंको कृतार्थ कीजिये' ॥ २ ॥ तब पक्षिराज भगवान्‌के मुखकी ओर देखकर उनके अमृतमय वचन सुन तथा शरीरको रामके नयनजलसे भीगा जान हँसकर बोले—'रघुनाथजी! मैं बलिहारी जाऊँ ! आप विश्वास कीजिये, मैं स्वभावसे ही कहता हूँ ॥ ३ ॥ मेरे मरनेके समान तो चारों फल भी नहीं हैं और यदि हों तो बतलाइये।' तुलसीदासजी कहते हैं, इसका उत्तर भगवान्‌ने मौन ही दिया, इससे मानो गृध्रराजके प्रेमपर सही पड़ गयी ॥ ४ ॥ [ १६ ] मेरो सुनियो, तात ! संदेसो । सीय-हरन जनि कहेहु पितासों, ह्वैहै अधिक अँदेसो ॥ १ ॥ रावरे पुन्यप्रताप-अनल महँ अकप दिननि रिपु दहिहैं। कुलसमेत सुरसभा दसानन समाचार सब कहिहैं ॥ २ ॥ सुनि प्रभु-बचन, राखि उर मूरति, चरन-कमल सिर नाई। चल्यो नभ सुनत राम-कल-कीरति, अरु निज भाग बड़ाई ॥ ३ ॥ पितु-ज्यों गीध-क्रिया करि रघुपति अपने धाम पठायो । ऐसो प्रभु बिसारि तुलसी सठ ! तू चाहत सुख पायो ॥ ४ ॥

२८३ अरण्यकाण्ड [रघुनाथजी बोले—] 'हे तात ! मेरा सन्देश सुनिये । पिताजीसे सीताजीके हरणकी बात मत कहना; क्योंकि इससे उनकी चिन्ता अधिक हो जायगी ॥ १ ॥ आपके पुण्य-प्रतापरूपी अग्निमें सब शत्रु थोड़े ही दिनोंमें दग्ध हो जायेंगे; उस समय से सब समाचार स्वयं रावण अपने कुटुम्बसहित देवसभामें जाकर सुना देगा' ॥ २ ॥ प्रभुके ये वचन सुन गृध्रराज उनकी मधुर मूर्ति हृदयमें धारणकर उनके चरणकमलोंमें सिर नवा रामकी पवित्र कीर्ति तथा अपने भाग्यकी बड़ाई सुनता आकाश-मार्गसे चला गया ॥ ३ ॥ रामचन्द्रजीने गृध्रका पिताके समान संस्कार कर उसे निजधाम भेज दिया । तुलसीदास कहते हैं, रे शठ ! तू ऐसे प्रभुको भूलकर भी सुख पाना चाहता है ? ॥ ४ ॥ शबरीसे भेंट राग सूहो [ १७ ] सबरी सोइ उठी, फरकत बाल बिलोचन-बाहु । सगुन सुहावने सूचत मुनि-मन-अगम उछाहू ॥ मुनि-अगम उर आनंद, लोचन सजल, तनु पुलकावली । तृन-पर्नसाल बनाइ, जल भरि कलस, फल चाहन चली ॥ मंजुल मनोरथ करति, सुमिरति बिप्र-बरबानी भली । ज्यौं कलप-बेलि सकेलि सुकृत सुफूल-फूली सुख फली ॥ १ ॥ आज शबरी सोकर उठी है तो उसका बायाँ नेत्र और बायीं भुजा फड़क रही है । ये सुहावने शकुन मुनियोंके भी मनको अगम उत्साहकी सूचना दे रहे हैं । उसके हृदयमें मुनियोंके लिये भी दुर्लभ

गीतावली २८४ आनन्द है, नेत्रोंमें जल भरा हुआ है और शरीर पुलकित हो रहा है। वह फूसकी पर्णकुटी बना, कलशमें जल भर, अपने शकुनका फल देखनेके लिये चली। वह मङ्गलमय मनोरथ करती है और बारम्बार मुनिवर मतङ्गकी शुभ वाणीका [कि तुझे श्रीरामजीका दर्शन होगा] स्मरण करती है, मानो सुन्दर फूलोंसे फूली हुई कल्पलता सम्पूर्ण सुकृतोंको एकत्र कर आज सुखरूप फलसे युक्त हुई है॥ १ ॥ प्रानप्रिय पाहुने ऐहैं राम-लषन मेरे आजु। जानत जन-जियकी मृदु चित राम गरीवनिवाजु॥ मृदु चित गरीवनिवाज आजु बिराजिहैं गृह आइकै। ब्रह्मादि संकर-गौरि पूजित पूजिहौं अब जाइकै॥ लहि नाथ हौं रघुनाथ-बानको पतितपावन पाइकै। दुहु ओर लाहु अघाइ तुलसी तीसरेहु गुन गाइकै॥ २ ॥ [वह सोचती है—] अहा! आज मेरे प्राणप्यारे पाहुने राम और लक्ष्मण आवेंगे। दीनवत्सल मृदुलचित्त भगवान् राम भक्तोंके अन्तःकरणकी बात जानते हैं। वे मृदुलचित्त गरीवनिवाज आज मेरे घर आकर विराजेंगे। अब मैं ब्रह्मा, शंकर और पार्वती आदि देवेश्वरोंसे पूजित भगवान् रामको जाकर पूजूँगी। रघुनाथजीका पतितपावन बाना पाकर अब मैं उन्हें अपने प्रभुरूपसे देखकर लोक- परलोक दोनों ओरका लाभ अघाकर लूटूँगी; और उनका गुण गाकर तीसरे तुलसीदास भी लाभान्वित होंगे॥ २ ॥ दोना रुचिर रचे पूरन कंद-मूल फल-फूल। अनुपम अमियहुतें अंबक अवलोकत अनुकूल॥ अनुकूल अंबक अंब ज्यों निज डिंब हित सब आनिकै। सुंदर सनेहसुधा सहस जनु सरस राखे सानिकै॥

२८५ अरण्यकाण्डः छन भवन, छन बाहर, बिलोकति पंथ भ्रूपर पानि कैं । दोउ भाइ आये सबरिकाके प्रेम-पन पहिचानिकैं ॥ ३ ॥ फिर शबरीने कन्द, मूल, फल और फूलोंसे भरे हुए सुन्दर दोने बनाये, जो बड़े ही अनुपम, अमृतसे भी अधिक स्वादिष्ट और नेत्रोंसे देखनेमें सुहावने थे। माता जिस प्रकार अपने बालकके लिये अच्छी-अच्छी चीजें रख छोड़ती है, उसी प्रकार उसने वे प्रिय और दर्शनीय फलादि भगवान्‌के लिये लाकर उन्हें मानो अमृतसे भी हजारों गुने अधिक स्नेहमें डुबोकर रक्खा। वह क्षणमें घरके भीतर चली जाती और क्षणभरमें ही बाहर आकर भृकुटिपर हाथ रखकर मार्गकी ओर ताकने लगती। इसी समय शबरीका ऐसा प्रेम और व्रत जानकर दोनों भाई उसके यहाँ आये ॥ ३ ॥ श्रवन सुनत चली, आवत देखि लषन-रघुराउ । सिथिल सनेह कहै, 'है सपना बिधि, कैधौं सति भाउ' ॥ सति भाउ कैं सपनो ? निहारि कुमार कोसलरायके । गहे चरन, जे अघहरन नत-जन, बचन-मानस-कायके ॥ लघु-भाग-भाजन उदधि उमग्यो लाभ-सुख चित चाय कैं। सो जननि ज्यौं आदरी सानुज, राम भूखे भायकैं ॥ ४ ॥ प्रभुका आगमन कानोंसे सुनकर वह आगे बढ़ी और फिर राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको देख स्नेहसे शिथिल होकर कहने लगी 'अरे विधाता ! यह कोई स्वप्न है या सच्ची घटना है ?' कोशल- राज महाराज दशरथके पुत्रोंको देखकर उसने 'यह स्वप्न है या सच्ची घटना ?' ऐसे कहते हुए उनके चरण पकड़े, जो विनीत भक्तोंके मन, वचन और शरीरके पापोंको दूर करनेवाले हैं। शबरीके हृदयमें

गीतावली २८६ यह सोचकर कि 'मैं तो छोटे ही सौभाग्यकी पात्री हूँ' इस परम लाभ और सुखको पाकर आनन्दका समुद्र उमड़ आया। भगवान् तो केवल भावके ही भूखे हैं। अतः उन्होंने तो भाई लक्ष्मणके सहित उसका माताके समान आदर किया ॥ ४ ॥ प्रेम-पट पाँवड़े देत, सुअरघ बिलोचन-बारि । आश्रम लै दिए आसन पंकज-पाँय पखारि ॥ पद-पंकजात पखारि पूजे, पंथ-श्रम-बिरहित भये । फल-फूल अंकुर-मूल घरे सुधारि भरि दोना नये ॥ प्रभु खात पुलकित गात, स्वाद सराहि आदर जनु जये । फल चारिहू फल चारि दहि, परचारि-फल सबरी दये ॥ ५ ॥ शबरी प्रेमरूप वस्त्रके पाँवड़े बिछाती और नेत्रजलसे अर्घ्य देती भगवान्‌को अपने आश्रमपर ले आयी और उनके चरणकमल धोकर उन्हें आसन दिये। भगवान्‌के चरणकमलोंको धोकर उसने उनका पूजन किया। इससे उनका मार्गका श्रम जाता रहा। फिर उसने फल, फूल, अंकुर और मूल आदि नये-नये दोनोंमें सजाकर भगवान्‌के आगे रखे और प्रभु उनका स्वाद सराह-सराहकर पुल- कितशरीर हो खाने लगे, मानो वे आदर उत्पन्न करते थे। भगवान् रामने शबरीके इन चार फलोंसे [अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष-इन] चारों फलोंको जलाकर उसे [प्रेमलक्षणा भक्तिरूप] सेवाका फल दिया ॥ ५ ॥ सुमन बरषि हरषे सुर, मुनि मुदित सराहि सिहात । 'केहि रुचि केहि छुधा सानुज मांगि मांगि प्रभु खात !! प्रभु खात माँगत देति सबरी, राम भोगी जागके ।' पुलकत प्रसंसत सिद्ध-सिव-सनकादि भाजन भागके ॥

२८७ अरण्यकाण्ड बालक सुमित्रा कौसिलाके पाहुने फल-सागके । सुनि समुझि तुलसी जानु रामहि बस अमल अनुरागके ॥ ६ ॥ इस समय देवतालोग पुष्प बरसाकर प्रसन्न हो रहे हैं और मुनिजन प्रसन्नचित्तसे प्रशंसा करते हुए आनन्दित होते हैं कि 'आज कैसी रुचि और कैसी क्षुधासे लक्ष्मणजीके सहित भगवान् राम माँग- माँगकर फल खा रहे हैं ! प्रभु राम तो सम्पूर्ण यज्ञोंके भोक्ता हैं, सो फल खाते हैं और माँग रहे हैं तथा शबरी भी बराबर दे रही हैं'—इस प्रकार बड़े भाग्यशाली शिव और सनकादि सिद्धगण पुलकित होकर शबरीकी प्रशंसा करते हैं । अहा ! माता कौसल्या और सुमित्राके पुत्र [जो तरह-तरहके व्यञ्जनोंका भोग लगानेवाले हैं] आज फल और शाकके मेहमान हैं ! तुलसीदास कहते हैं, यह सुन और समझकर तू यह निश्चय जान कि भगवान् राम एकमात्र निर्मल प्रेमके अधीन हैं ॥ ६ ॥ रघुबर अँचइ उठे, सबरी करि प्रनाम कर जोरि । हौं बलि बलि गई, पुरई मंजु मनोरथ मोरि ॥ पुरई मनोरथ स्वारथहु परमारथहु पूरन करी । अघ-अवगुनन्हिकी कोठरी करि कृपा मुद मंगल भरी ॥ तापस-किरातिनि-कोल मृदु मूरति मनोहर मन घरी । सिर नाइ, आयसु पाइ गवने, परमनिधि पाले परी ॥ ७ ॥ [इस प्रकार भोजन करनेके अनन्तर] प्रभु आचमन करके उठे । तब शबरीने प्रणाम कर हाथ जोड़कर कहा—'मैं बलि-बलि जाती हूँ, आज आपने मेरी प्रिय कामना पूरी कर दी । आपने मेरा

गीतावली २८८ मनोरथ पूर्ण कर दिया और स्वार्थ तथा परमार्थ भी पूरा कर दिया। मैं पाप और अवगुणोंकी कोठरी थी, जिसे आपने कृपा करके आनन्द और मङ्गलसे भर दिया।' उस समय तपस्वी, किरातिनी और कोल आदि वनवासियोंने प्रभुकी मृदुल और मनोहर मूर्ति हृदयमें धारण की तथा प्रभुको सिर नवा, उनकी आज्ञा पा, भक्तिरूप परमधन प्राप्त कर अपने-अपने धामोंको गये ॥ ७ ॥ सिय-सुधि सब कही नख-सिख निरखि निरखि दोउ भाइ। दै दै प्रदच्छिना करति प्रनाम, न प्रेम अघाइ ॥ अति प्रीति मानस राखि रामहि, राम-धामहि सो गई । तेहि मातु-ज्यों रघुनाथ अपने हाथ जल-अंजलि दई ॥ तुलसी-भनित, सबरी-प्रनति, रघुबर-प्रकृति करुनामई । गावत, सुनत, समुझत भगति हिय होइ प्रभुपद नित नई ॥ ८ ॥ शबरीने दोनों भाइयोंको नखसे शिखातक देख-देखकर उन्हें सीताजीका सारा समाचार सुना दिया। चलते समय उसने भगवान्‌की बारम्बार प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम किया; उस समय उसका हृदय प्रेमसे अघाता नहीं था। इस प्रकार अत्यन्त प्रीतिपूर्वक हृदयमें भगवान् रामको धारणकर वह भगवान्‌के धामको चली गयी। तब रघुनाथजीने उसे माताके समान अपने हाथोंसे जलाञ्जलि दी। तुलसीदासकी कविता, शबरीकी विनय और रघुनाथजीका करुणामय स्वभाव गाने, सुनने और समझनेसे हृदयमें प्रभुके चरणोंकी नित्य नयी भक्ति होती है ॥ ८ ॥

ॐ श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली

किष्किन्धाकाण्ड
ऋष्यमूकपर राम
राग केदारा
[ १ ]
भूषन-बसन बिलोकत सियके ।
प्रेम-बिबस मन, कंप पुलक तनु, नीरजनयन नीर भरे पियके ॥१॥
सकुचत कहत, सुमिरि उर उमगत, सील-सनेह-सुगुनगन तियके ।
स्वामि-दसा लखि लखन सखा कपि, पिघले हैं आंच माठ मानो घियके २
सोचत हानि मानि मन, गुनि गुनि, गये निघटि फल सकल सुकियके ।
बरने जामवंत तेहि अवसर, बचन बिबेक बीररस बियके ॥३॥
धीर बीर सुनि समुझि परसपर बल-उपाय उघटत निज हियके ।
तुलसिदास यह समउ कहेतें कबि लागत निपट निठुर जड़ जियके ॥४॥
[ऋष्यमूक पर्वतपर पहुँचनेपर भगवान् रामकी सुग्रीवके साथ
मित्रता हुई । उन्होंने भगवान्‌को सीताजीके वस्त्राभूषण, जिन्हें वे
रावणके साथ आकाशमार्गसे जाते समय ऋष्यमूक पर्वतपर वानरोंको
देखकर डाल गयी थीं, दिखलाये । उस समय] सीताजीके वस्त्र और
आभूषणोंको देखते ही भगवान्‌का मन प्रेमसे अधीर हो गया,
गी० १९-

गीतावली २६० शरीरमें कम्प और पुलकावली छा गयी तथा नेत्रकमलोंमें जल भर आया ॥ १ ॥ सीताजीके शील, स्नेह और शुभ गुणोंको कहनेमें तो प्रभु सकुचाते हैं, परन्तु उनकी याद आनेसे हृदय उमड़ रहा है। स्वामीकी यह दशा देख लक्ष्मणजी, सखा सुग्रीव तथा अन्य वानरगण इस प्रकार द्रवीभूत हो गये, जैसे अग्निका संयोग पाकर घीके मटके चूने लगते हैं ॥ २ ॥ सीताजीके गुणोंको मन-ही-मन सोचकर, उनके वियोगसे बड़ी हानि मान वे शोक करते हैं, मानो उनके समस्त पुण्यफल समाप्त हो गये। उस समय जाम्बवान्‌ने विवेक और वीरता दोनोंसे सने हुए वचन कहे ॥ ३ ॥ उन्हें सुन और समझकर उन धीर-वीरोंने आपसमें अपने बल और हृदयमें सोचे हुए उपाय प्रकट किये। तुलसीदास कहते हैं, उस समयका वर्णन करनेसे कवि हृदयके सर्वथा निठुर और जड़ जान पड़ते हैं ॥४॥ सीताजीकी खोजका आदेव [ २ ] प्रभु कपि-नायक बोलि कह्यो है। बरषा गई, सरद आई, अब लगि नहि सिय-सोधु लह्यो है ॥ १ ॥ जा कारन तजि लोकलाज, तनु राखि बियोग सह्यो है। ताको तौ कपिराज आज, लगि कछु न काज निबह्यो है ॥ २ ॥ सुनि सुग्रीव सभीत नमित-मुख, उतरु न देन चह्यो है। आइ गए हरि जूथ, देखि उर पूरि प्रमोद रह्यो है ॥ ३ ॥ पठये बदि बदि अवधि दसहु दिसि, चले बलु सबनि गह्यो है। तुलसी सिय लगि भव-दधिनिधि मनु फिर हरि चहत मह्यो है ॥ ४ ॥ प्रभुने वानरराज सुग्रीवको बुलाकर कहा—'भाई ! वर्षा ऋतु बीत गयी और शरद् ऋतु भी आ गयी, किन्तु अभीतक तुमने

२६१ सुन्दरकाण्ड सीताकी कोई खोज नहीं की ॥ १ ॥ जिसके लिये मैंने लोकसज्जाको त्यागकर, शरीरको जीवित रख यह वियोग सहन किया है, हे कपिराज ! उसका आजतक तुमने कोई भी काम पूरा नहीं किया ॥ २ ॥ यह सुन सुग्रीवने भयभीत हो अपना मुख नीचा कर लिया और उसे कुछ भी उत्तर देनेका साहस न हुआ, इतने- हीमें किष्किन्धा नगरमें वानरोंके बहुत-से यूथ आ गये, जिन्हें देखकर सर्वत्र आनन्द छा गया ॥ ३ ॥ उन सबको लौटनेकी अवधि निश्चित कर दशों दिशाओंमें भेजा गया और उन सबने भी इस कार्य के लिये हृदयमें बल धारण किया। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो भगवान् सीताजीके लिये एक बार फिर संसारसमुद्रको मथना चाहते हैं ॥ ४ ॥ —**— सुन्दरकाण्ड अशोकवनमें हनूमान् राग केदारा [ १ ] रजायसु रामको जब पायो । गाल मेलि मुद्रिका, मुदित मन पवनपूत सिर नायो ॥ १ ॥

गीतावली २३२ भालुनाथ-नल-नील साथ चले, बली बालिको जायो । फरकि सुअँग भए सगुन, कहत मानो मग मुद-मंगल छायो ॥ २ ॥ देखि बिबर, सुधि पाइ गीधसों सबनि अपनो बलु मायो । सुमिरि राम, तकि तरकि तोयनिधि, लंक लूक-सो आयो ॥ ३ ॥ खोजत घर-घर, जनु दरिद्र-मनु फिरत लागि धन घायो । तुलसी सिय बिलोकि पुलक्यो तनु, भूरिभाग भयो भायो ॥ ४ ॥ जिस समय भगवान् रामकी आज्ञा मिली, उस समय पवनपुत्र हनुमान्‌जीने भगवान्‌की दी हुई मुद्रिका (अँगूठी) को मुखमें डाल उन्हें प्रसन्नचित्तसे सिर नवाया ॥ १ ॥ उनके साथ जाम्बवान्, नल, नील और बालिपुत्र वीरवर अङ्गद चले । चलते समय उनके शुभ अङ्ग फड़ककर शकुन हुए, जो मानो मार्गके आनन्दपूर्ण और मङ्गलमय होनेकी सूचना देते थे ॥ २ ॥ मार्गमें उन्होंने एक गुहाका निरीक्षणकिया और फिर गृध्रराज सम्पातीसे सीताजीका पतापा सबने अपने-अपने बलका अन्दाज लगाया । [ अन्तमें जाम्बवान्‌के उत्तेजित करनेपर] हनुमान्‌जी भगवान् रामका स्मरण कर, समुद्रका ओर ताककर और उसे लाँघकर आकाशमें जाती हुई उल्काकी तरह लङ्कापुरीमें आये ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जिस प्रकार धनके लिये दरिद्रका मन भटकता फिरता है, उसी प्रकार घर-घरमें ढूंढ़ते- ढूंढ़ते अन्तमें सीताजीका दर्शन होनेपर उनका शरीर पुलकित हो गया । इस प्रकार अभीष्ट सिद्ध होनेपर उन्होंने अपनेको बड़भागी समझा ॥ ४ ॥ [ २ ] देखी जानकी जब जाइ । परम धीर समीरसुतके प्रेम उर न समाइ ॥ १ ॥

२६३ सुन्दरकाण्ड कृस सरीर सुभाय सोभित, लगी उड़ि उड़ि धूलि । मनहु मनसिज मोहनी-मनि गयो भोरे भूलि ॥ २ ॥ रटति निसिबासर निरंतर राम राजिवनैन । जात निकट न बिरहिनी-अरि अकनि ताते बैन ॥ ३ ॥ नाथके गुनगाथ कहि कपि दई मुंदरी डारि । कथा सुनि उठि लई कर बर, रुचिर नाम निहारि ॥ ४ ॥ हृदय हरष-बिषाद अति पति-मुद्रिका पहिचानि । दास तुलसी दसा सो केहि भाँति कहै बखानि ? ॥ ५ ॥ जिस समय परमधीर हनुमान्जीने लङ्कामें पहुँचकर सीताजी- को देखा, उस समय उनके हृदयमें प्रेम नहीं समाता था ॥ १ ॥ उनका कृश शरीर स्वभावसे ही शोभायमान था, उसपर उड़-उड़कर धूल जम गयी थी, वे ऐसी जान पड़ती थीं, मानो कामदेव भूलसे अपनी मोहनी मणिको भूल गया हो ॥ २ ॥ वे रात-दिन निरन्तर कमलनयन भगवान् रामका नाम ही रट रही थीं । उनके उन शोक- संतप्त वचनोंको सुनकर विरहिणी स्त्रियोंका शत्रु [ शीतल-मन्द- सुगन्ध पवन ] उनके पास नहीं जाता था [ क्योंकि उसे स्वयं उस विरहाग्निमें दग्ध हो जानेका भय था ] ॥ ३ ॥ यह देख हनुमान्जी- ने प्रभु रामकी गुणगाथा कहते हुए वह मुद्रिका डाल दी । सीताजी- ने वह कथा सुनकर और उसपर भगवान्‌का मनोहर नाम देखकर वह मुद्रिका अपने सुन्दर हाथमें उठा ली ॥ ४ ॥ पतिकी मुद्रिकाको पहचानकर उनके हृदयमें बड़ा ही हर्ष और विषाद हुआ* । उस दशाका तुलसीदास किस प्रकार वर्णन कर सकता है ॥ ५ ॥ *प्रियतमकी वस्तु मिली—इससे तो हर्ष हुआ; परन्तु यह सोचकर कि यह यहाँ कैसे आयी, कोई अनिष्ट तो नहीं हो गया—दुःख हुआ ।