गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २७६ कोलिनि-कोल-किरात जहां तहां बिलखात, बन न बिलोकि जात खग-मृग-माल ॥ २ ॥ तरु जे जानकी लाए, ज्याये हरि-करि-कपि, हेरें न हुँकरि, झरें फल न रसाल । जे सुक-सारिका पाले, मातु ज्यों ललकि लाले, तेऊ न पढ़त, न पढ़ावैं मुनिबाल ॥ ३ ॥ समुझि सहमे सुठि, प्रिया तौ न आई उठि, तुलसी बिबरन परन-तृन-साल । औरै सो सब समाजु, कुसल न देखौं आजु, गहबर हिय कहैं कोसलपाल ॥ ४ ॥ इतनेहीमें रघुवंशमणि भगवान् राम कनकमृगको मारकर लौटे। लक्ष्मणजी अपने हाथमें उसकी मनोहर मृगछाला लिये हुए थे। आश्रमको आते समय उन्हें अच्छे शकुन नहीं हुए। उनकी वाम भुजा और विशाल नयन फड़क रहे थे ॥ १ ॥ नदियोंका जल मैला दिखायी देता था। कमल तालाबोंमें भी सूख रहे थे, भ्रमर गुंजार नहीं करते थे और हंस मनोहर शब्द नहीं करते थे। किरात, कोल और कोलिनी जहां-तहां बिलख रहे थे, वनके पक्षी और मृगसमूहकी ओर देखा नहीं जाता था ॥ २ ॥ जानकीजीने जिन वृक्षोंको लगवाया था, वे रसीले फल नहीं देते थे और जिन सिंह, हाथी और वानरोंका उन्होंने पोषण किया था, वे हुंकार भरकर देखते नहीं थे । जिन शुक और सारिकाओंको सीताजीने पाला था और माताके समान बड़े चावसे जिन्हें लाड़ लड़ाया था, वे भी इस समय पढ़ते नहीं थे और न मुनि- बालिकाएँ उन्हें पढ़ाती ही थीं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जब