गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७७ अरण्यकाण्ड कोसलपाल प्रभु रामने देखा कि प्राणप्रिया सीताजी स्वागत करनेके लिये नहीं आयीं और पर्णकुटी भी विवरण (कान्तिहीन) जान पड़ती है तो वे सब रहस्य जानकर सहम गये और विह्वलहृदयसे कहने लगे—'आज सारा समाज और ही तरहका हो रहा है, मुझे कुशल नहीं जान पड़ती' ॥ ३ ॥ [ १० ] आश्रम निरखि भूले, द्रुम न फले न फूले, अलि-खग-मृग मानो कबहुँ न हे। मुनि न मुनिबधूटी, उजरी परनकुटी, पंचबटी पहिचानि ठाढ़ेइ रहे ॥ १ ॥ उठी न सलिल लिए, प्रेम मुदित हिए, प्रिया न पुलकि प्रिय बचन कहे। पल्लव-सालन हेरी, प्रानबलभा न टेरी, बिरह बिथकि लखि लषन गहे ॥ २ ॥ देखे रघुपति-गति बिबुध बिकल अति, तुलसी गहन बिनु दहन बहे। अनुज दियो भरोसो, तौलौँहै सोचु खरो सो, सिय-समाचार प्रभु जौलौं न लहे ॥ ३ ॥ वे आश्रमको देखकर भी भूल गये, क्योंकि वहाँके वृक्ष न फूले हैं, न फले हैं। भौंरे, पक्षी और मृग तो मानो वहाँ कभी थे ही नहीं; इसके सिवा न वहाँ मुनि थे और न मुनिपत्नियाँ ही। पर्णकुटी भी उजड़ी पड़ी थी। भगवान् पञ्चवटीको पहचानकर खड़े ही रह गये ॥ १ ॥ वे कहने लगे—'आज प्राणप्रिय प्रसन्नचित्तसे जल लेकर नहीं उठी और न उसने कोई प्रिय वचन ही कहे, [और दिकको