गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २७८ तरह] आज पत्तोंके झरोखोंमेंसे देखकर उसने आवाज भी नहीं दी।' इस प्रकार विरह-व्यथासे थकित देखकर उन्हें लक्ष्मणजीने पकड़ लिया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, रघुनाथजीकी ऐसी दशा देखकर देवतालोग बड़े व्याकुल हो गये और वन अग्निके बिना ही दग्धसे हो गये। तब भाई लक्ष्मणने उन्हें भरोसा दिया कि जबतक प्रभुको सीताजीका समाचार नहीं मिलता तभीतक यह शोक खड़ा- सा रहेगा॥ ३ ॥ राग सोरठ [ ११ ] जबहिं सिय-सुधि सब सुरनि सुनाई। भए सुनि सजग, बिरहसरि पैरत थके थाह-सी पाई ॥ १ ॥ कसि तुनीर-तीर धनु-धर-धुर धीर बीर दोउ भाई। पंचबटी-गोदहि प्रनाम करि, कुटी दाहिनी लाई ॥ २ ॥ चले बूझत बन-बेलि-बिटप, खग-मृग, अलि-अवलि सुहाई। प्रभुकी दसा सो समौ कहिबे को कबि उर आह न आई ॥ ३ ॥ रटनि अकनि पहिचानि गीध फिरे करुनामय रघुराई। तुलसीदासहि प्रिया बिसरि गईं, सुमिरि सनेह-सगाई ॥ ४ ॥ जिस समय देवताओंने सीताकी सारी सुधि कही, उस समय भगवान् उसे सुनकर सचेत हो गये। वे विरहरूप नदीमें तैर रहे थे, सो तैरते-तैरते इस समय उन्हें कुछ सहारा-सा मिल गया ॥ १ ॥ तब धनुर्धरोंमें धुरन्धर दोनों धीर-वीर भाई तीर और तरकस कस, पञ्चवटी और गोदावरीको प्रणाम कर कुटीकी प्रदक्षिणा कर वनके लता, वृक्ष, पक्षी, मृग और सुन्दर भ्रमरनिकरसे पूछते हुए आगे चले।