गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७९ : अरण्यकाण्ड उस समयकी प्रभुकी दशाका वर्णन करनेको कविके हृदयमें हिम्मत ही नहीं रही [अर्थात् वे भी शोकके कारण अवाक् रह गये] ॥२-३॥ इतनेमें ही राम-नामकी रटन सुन गृध्रराजको पहचानकर करुणामय प्रभु लौटे। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय जटायुका प्रेम-सम्बन्ध याद आनेसे भगवान् रामको प्रियाका भी स्मरण नहीं रहा ॥४॥ जटायुसे भेंट [१२] मेरे एकौ हाथ न लागी। गयो बपु बीति बादि कानन, ज्यों कल्पलता दव दागी ॥१॥ दसरथसों न प्रेम प्रतिपाल्यो, हुतो जो सकल जग साखी। बरबस हरत निसाचर पतिसों हठि न जानकी राखी ॥२॥ मरत न मैं रघुबीर बिलोके तापस बेष बनाए। चाहत चलन प्रान पाँवर बिनु सिय-सुधि प्रभुहि सुनाए ॥३॥ बारबार कर मीजि, सीस धुनि गीधराज पछिताई। तुलसी प्रभु कृपालु तेहि औसर आइ गए दोउ भाई ॥४॥ [गृध्रराज मन-ही-मन पश्चात्ताप कर रहे हैं] 'हाय ! मेरे हाथ एक भी बात नहीं लगी। सिज प्रकार वनमें कल्पलता—किसीके काम न आकर—दावानलसे दग्ध हो जाय, उसी प्रकार मेरा शरीर भी यों ही समाप्त हो गया ॥ १ ॥ दशरथजीसे हमारा प्रेम था— इसको सारा जगत् जानता है, किन्तु मैं उसे भी नहीं निभा सका, क्योंकि जिस समय राक्षसराज सीताको हरे लिये जाता था, उस समय मैं उसे बलपूर्वक रोक न सका ॥ २ ॥ मरनेके समय भी मैं मुनिवेष- धारी रामको न देख सका; अब प्रभुको सीताजीकी सुधि सुनाये बिना