गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंही ये पामर प्राण प्रयाण करना चाहते हैं' ॥ ३ ॥ इस प्रकार गृध्रराज बारम्बार हाथ मल सीस धुन-धुनकर पछताते हैं। इसी समय तुलसीदासके प्रभु दोनों कृपालु भाई वहाँ आ गये ॥ ४ ॥ [ १३ ] राघौ गीध गोद करि लीन्हों। नयन-सरोज सनेह-सलिल सुचि मनहु अरघजल दीन्हों ॥ १ ॥ सुनहु, लषन ! खगपतिहि मिले बन मैं पितु-मरन न जान्यौ। सहि न सक्यौ सो कठिन बिधाता, बड़ो पछु आजुहि भान्यौ ॥ २ ॥ बहु बिधि राम कह्यौ तनु राखन, परम धीर नहिं डोल्यौ। रोकि प्रेम, अवलोकि बदन-'वधु, बचन मनोहर बोल्यौ ॥ ३ ॥ तुलसी प्रभु झूठे जीवन लगि समय न धोखो लैहों। जाको नाम मरत मुनि दुरलभ तुमहिं कहाँ पुनि पैहों ? ॥ ४ ॥ रघुनाथजीने गृध्रको गोदमें उठा लिया और अपने नयनकमल- द्वारा सनेहरूप पवित्र जलसे मानो अर्घ्यदान किया ॥ १ ॥ फिर कहने लगे—'लक्ष्मण ! सुनो, वनमें पक्षिराजसे मिल लेनेपर मुझे पिताजीका मरना याद ही नहीं आया। परन्तु कुटिल विधाता मेरे इस सुखको सहन नहीं कर सका; इसीसे आज उसने यह बड़ा प्रबल पक्ष नष्ट कर दिया' ॥ २ ॥ फिर रघुनाथजीने जटायुसे शरीर रखने- के लिये बहुत प्रकारसे कहा; परन्तु वह परम धीर अपने निश्चयसे विचलित नहीं हुआ और अपने प्रेमको रोक, प्रभुका मुखचन्द्र देख- कर ये मनोहर वचन बोला—॥ ३ ॥ 'हे प्रभो ! इस समय झूठे जीवनके लिये मैं धोखा नहीं खाऊँगा। भला, जिनका नाम मरते समय मुनियोंको भी दुर्लभ है उन आपको मैं फिर कहाँ पाऊँगा' ॥४॥