गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७५ अरण्यकाण्ड बिरथ बिकल कियो, छीन लीन्हि सिय, घन घायनि अकुलान्यो ॥ तब असि काढ़ि, काटि पर पाँवर लै प्रभु-प्रिया परान्यो ॥ २ ॥ रामकाज खगराज आजु लरचो, जियत न जानकि त्यागी ॥ तुलसिदास सुर-सिद्ध सराहत, धन्य बिहँग बड़भागी ॥ ३ ॥ जटायुने रावणको बारम्बार फटकारा, परन्तु वह पीछे नहीं फिरा, तब उसने बड़ी फुर्तीसे चोंच और पंजोंसे घोड़ोंको मारकर रथके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ १ ॥ फिर रावणको रथहीन करके व्याकुल कर दिया और सीताजीको छीन लिया। तब नीच रावणने बहुत-से घावोंसे व्यथित हो तलवार निकालकर उसके पंख काट डाले और प्रभुकी प्राणप्रिया सीताजीको लेकर चल दिया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय देवता और सिद्धगण जटायुकी प्रशंसा करने लगे कि देखो, आज रामकार्यके लिये पक्षिराजने रावणसे युद्ध किया और जीते-जी जानकीको नहीं छोड़ा। बड़भागी जटायु धन्य हैं ॥ ३ ॥ रामकी वियोग-व्यथा राग गौरी [ ९ ] हेमको हरिन हनि फिरे रघुकुल-मनि, लषन ललित कर लिये मृगछाल ॥ आश्रम आवत चले, सगुन न भए भले, फरके बाम बाहु, लोचन बिसाल ॥ १ ॥ सरित-जल मलिन, सरनि सूखे नलिन, अलि न गुंजत, कल कूजें न मराल ॥