गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
२५५ अयोध्याकाण्ड [ ७५ ] काहेको मानत हानि हिये हौँ ? प्रीति-नीति-गुन-सील-धरम कहँ तुम अवलंब दिये हौ ॥ १ ॥ तात ! जात जानिबे न ए दिन, करि प्रमान पितु-बानी । ऐहौँ बेगि, धरहु धीरज उर कठिन कालगति जानी ॥ २ ॥ तुलसिदास अनुजहि प्रबोधि प्रभु चरनपीठ निज दीन्हें । मनहु सबनिके प्रान-पाहरू भरत सीस धरि लीन्हें ॥ ३ ॥ [भगवान् बोले—] 'भैया ! अपने हृदयमें ऐसी ग्लानि क्यों मानते हो ? तुमने तो प्रीति, नीति, गुण, शील और धर्म—सभीको सहारा दे रखा है ॥ १ ॥ हे तात ! तुम्हें ये दिन तो जाते हुए मालूम भी न होंगे । इतनेहीमें मैं पिताके वचनोंको पूरा कर शीघ्र ही लौट आऊँगा । तुम कालकी गतिको कठिन जानकर हृदयमें धैर्य धारण करो' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भाई को इस प्रकार समझाकर भगवान्ने उन्हें अपनी चरणपादुकाएँ दे दीं और भरतजीने सबके प्राणोंके प्रहरोरूप उन पादुकाओंको अपने सिरपर लगाते हुए ग्रहण किया ॥ ३ ॥ [ ७६ ] बिनती भरत करत कर जोरे । दीनबंधु ! दीनता दीनकी कबहुँ परै जनि भोरे ॥ १ ॥ तुम्हसे तुम्हहि नाथ मोको, मोसे जन तुमको बहुतेरे । इहै जानि, पहिचानि प्रीति, छमिए अघ-औगुन मेरे ॥ २ ॥ यों कहि सीय-राम-पाँयनि परि लषन लाइ उर लीन्हें । पुलक सरीर, नीर भरि लोचन, कहत प्रेम-पन कीन्हें ॥ ३ ॥
गीतावली २५६
तुलसी बीते अवधि प्रथम दिन जो रघुबीर न ऐहौ । तौ प्रभु-चरन सरोज-सपथ जीवत परिजनहि न पैहौ ॥ ४ ॥ [चलते समय] भरतजी हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं—'हे दीनबन्धो ! इस दीनकी दीनता कभी भूलमें न पड़ जाय ॥ १ ॥ हे नाथ ! मेरे लिये आप-जैसे प्रभु तो आप ही हैं; किन्तु आपके लिये मेरे समान सेवक अनेकों हैं—यह जानकर और मेरी आन्तरिक प्रीति पहचानकर आप मेरे अपराध और अवगुण क्षमा करें' ॥ २ ॥ ऐसा कहकर भरतजीने राम और सीताके चरणोंमें गिरकर लक्ष्मणजीको हृदयसे लगाया और फिर पुलकितशरीर हो, नेत्रोंमें जल भरकर प्रेमकी प्रतिज्ञा करके कहने लगे ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, [वह प्रतिज्ञा यह थी—] हे रघुनाथजी ! वनवासकी अवधि समाप्त हो जानेपर यदि आप पहले ही दिन अयोध्यामें न आये तो प्रभुके चरणकमलोंकी सौगन्ध, आप अपने दासको जीवित न पा सकेंगे ॥ ४ ॥ [ ७७ ] अवसि हौं आयसु पाइ रहौंगो । जनमि कैकयी-कोखि कृपानिधि ! क्यों कछु चपरि कहौंगो ॥ १ ॥ 'भरत भूप, सिय-राम-लषन बन,' सुनि सानंद सहौंगो । पुर-परिजन अवलोकि मातु सब सुख-संतोष लहौंगो ॥ २ ॥ प्रभु जानत, जेहि भाँति अवधिलौं बचन पालि निबहौंगो । आगेकी बिनती तुलसी तब, जब फिरि चरन गहौंगो ॥ ३ ॥ 'कृपानिधे ! आपकी आज्ञा पाकर मैं अवश्य अयोध्यामें ही रहूँगा; कैकेयीके गर्भसे जन्म लेकर भला मैं कोई बात बढ़कर कैसे
२५७ अयोध्याकाण्ड कह सकता हूँ॥ १॥ अब मैं 'भरत राजा हैं और सीता, राम तथा लक्ष्मण वनमें हैं' यह बात सुनकर आनन्दपूर्वक सहन करूँगा तथा नगर, कुटुम्बी लोग और सब माताओंको देखकर सुख एवं सन्तोष पाऊँगा ॥ २ ॥ जिस प्रकार मैं आपकी आज्ञा मानकर वनवासकी अवधिपर्यन्त निर्वाह करूंगा, सो तो प्रभु जानते ही हैं; अब आगेकी विनती उसी समय करूँगा, जब पुनः इन चरणोंको पकडूंगा ॥ ३ ॥ [ ७८ ] प्रभुसों मैं ढीठो बहुत दई है। कीबी छमा, नाथ ! आरतितें कही कुजुगुति नई है॥ १ ॥ यों कहि, बार बार पांयनि परि, पाँवरि पुलकि लई है। अपनो अदिन देखि हौं डरपत, जेहि बिष बेलि बई है॥ २ ॥ आए सदा सुधारि गोसाईं, जनतें बिगरि गई है। थके बचन पैरत सनेह सरि, परचो मानो घोर घई है ॥ ३ ॥ चित्रकूट तेहि समय सबनिकी बुद्धि बिषाद हई है। तुलसी राम-भरतके बिछुरत सिला सप्रेम भई है ॥ ४ ॥ 'इस समय प्रभुके साथ मैंने बहुत ढिठाई की है [ क्योंकि चुप रहनेके बजाय इतना तर्क-वितर्क किया ] । किन्तु हे नाथ ! दुःखके कारण मैंने जो कोई नयी कुयुक्ति कही हो उसे क्षमा करें' ॥ १ ॥ ऐसा कह भरतजीने बारम्बार प्रभुके चरणोंमें गिर पुलकित- शरीर हो उनकी पादुकाएँ उठा लीं [ और कहने लगे— ] 'मैं तो अपना कुसमय देखकर डरता हूँ जिसने इस समय यह सारी विषकी बेलि बोयी है ॥ २ ॥ हे स्वामिन् ! जब-जब दाससे कुछ बिगाड़ हुआ, तब-तब सदासे ही आप सुधारते आये हैं' ऐसा कहकर गी० १७-
गीतावली २५८ भरतजीके वचन थकित हो गये, मानो स्नेह-सरितामें तैरते-तैरते वे किसी भयंकर भँवरमें पड़ गये हों ॥ ३ ॥ उस समय चित्रकूटमें सभीकी बुद्धियाँ विषादग्रस्त हो गयीं । तुलसीदासजी कहते हैं, तब राम और भरतका त्रियोग होने देख वहाँकी शिला भी प्रेमवश (द्रवीभूत) हो गयी ॥ ४ ॥ रामविधुरा अयोध्या [ ७९ ] जबतें चित्रकूटतें आए । नंदिग्राम खनि अवनि, डासि कुस, परनकुटी करि छाए ॥ १ ॥ अजिन बसन, फल असन, जटा धरे रहत अवधि चित दीन्हें । प्रभु-पद-प्रेम-नेम-ब्रत निरखत मुनिन्ह नमित मुख कीन्हें ॥ २ ॥ सिंहासनपर पूजि पादुका बारहि बार जोहारे । प्रभु-अनुराग माँगि आयसु पुरजन सब काज सँवारे ॥ ३ ॥ तुलसी ज्यों ज्यों घटत तेज तनु, त्यों त्यों प्रीति अधिकाई । भए, न हैं, न होहिंगे कबहुँ भुवन भरत-से भाई ॥ ४ ॥ जबसे भरतजी चित्रकूटसे लौटकर आये हैं, तबसे नन्दिग्राममें पृथ्वी खोदकर उसमें कुश बिछा, पत्तोंकी कुटी बना, वहीं रहते हैं ॥ १ ॥ वहाँ मृगचर्म धारण किये फलाहार करते सिरपर जटाएँ धारण कर अवधिमें चित्त लगाये हुए हैं । प्रभुके चरणोंमें उनके प्रेम, नियम और व्रतको देखकर तो मुनियोंने भी लज्जावश अपना मस्तक नीचा कर लिया है ॥ २ ॥ वे प्रभुकी पादुकाओंको सिंहासनपर पूजकर बारम्बार उनकी वन्दना करते हैं और प्रभु-प्रेमसे भरकर उनकी आज्ञा ले पुरवासियोंके सब कार्य सँभालते हैं ॥ ३ ॥
२५६ अयोध्याकाण्ड तुलसीदास कहते हैं, ज्यों ज्यों उनके शरीरका तेज (पुष्टता) घटता है, त्यों-त्यों उनकी प्रीति बढ़ती जाती है। संसारमें भरत-जैसे भाई न कभी हुए हैं, न हैं और न भविष्यमें ही कभी होंगे ॥ ४ ॥ राग रामकली [ ८० ] राखो भगति-भलाई भली भाँति भरत । स्वारथ-परमारथ-पथी जय जय जग करत ॥ १ ॥ जो ब्रत मुनिवरनि कठिन मानसँ आचरत । सो ब्रत लिए चातक-ज्यों, सुनत पाप हरत ॥ २ ॥ सिंहासन सुभग राम-चरन-पीठ धरत । चालत सब राजकाज आयसु अनुसरत ॥ ३ ॥ आपु अवध, बिपिन बंधु, सोच-जरनि जरत । तुलसी सम-बिषम, सुगम-अगम लखि न परत ॥ ४ ॥ भरतने भक्ति और भलाईकी बहुत अच्छी तरह रक्षा की है। वे स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही मार्गोंमें चलनेवाले हैं, सारा संसार उनका जय-जयकार करता है ॥ १ ॥ जिस [अनन्य] व्रतका मुनियोंको मनसे भी आचरण करना कठिन है, उसे उन्होंने चातकके समान निभाया, जिसका श्रवण करनेसे ही सब पाप दूर हो जाते हैं ॥ २ ॥ वे भगवान् रामकी चरणपादुकाओंको एक सुन्दर सिंहासनपर रखते हैं और उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हुए सब राजकार्यका सञ्चालन करते हैं ॥ ३ ॥ 'आप स्वयं अयोध्यामें हैं और भाई वनमें हैं' इस शोकरूप दाहसे वे जलते रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार भरत और रघुनाथजीको [अयोध्या-
और वनकी] समता और विषमता अथवा सुगमता और दुर्गमता दिखायी भी नहीं देती [अर्थात् भरतजीको अयोध्याका सुख प्रतीत नहीं होता और रघुनाथजीको वनका दुःख नहीं जान पड़ता]॥ ४ ॥ [ ८१ ] मोहि भावति, कहि आवति नहि भरतजूकी रहनि । सजल नयन सिथिल बयन प्रभु-गुन-गन कहनि ॥ १ ॥ असन-बसन-अयन-सयन धरम गरुअ गहनि । दिन दिन पन-प्रेम-नेम निरुपाधि निरबहनि ॥ २ ॥ सीता-रघुनाथ-लखन-बिरह-पीर सहनि । तुलसी तजि उभय लोक रामचरन-चहनि ॥ ३ ॥ भरतजीका रहन-सहन मुझे बड़ा प्रिय लगता है, किन्तु कहा नहीं जाता ॥ उनका वह सजल नेत्र और शिथिल वाणीसे प्रभुका गुणगान करना ॥ १ ॥ भोजन, वस्त्र, गृह और शयन-सम्बन्धी कठोर धर्मोंका ग्रहण करना, दिनोंदिन निरुपाधि, प्रतिज्ञा, प्रेम और नियमको निभाना ॥ २ ॥ सीता, राम और लक्ष्मणजीके वियोगकी व्यथा सहन करना तथा लोक-परलोक दोनोंका त्याग कर केवल भगवान् रामके चरणोंकी इच्छा करना [ये सभी अकथनीय हैं] ॥ ३ ॥ [ ८२ ] जानी है संकर-हनुमान-लषन-भरत राम-भगति । कहत सुगम, करत अगम, सुनत मीठी लगति ॥ १ ॥ लहत सकृत, चहत सकल, जुग जुग जगमगत्ति । राम-प्रेम-पथतें कबहूँ डोलति नहिं, डगति ॥ २ ॥ रिद्धि-सिद्धि, बिधि चारि सुगति जा बिनु गति अगति । तुलसी तेहि सनमुख बिनु बिषय-ठगिनि ठगति ॥ ३ ॥
रामकी भक्तिको तो श्रीमहादेवजी, हनुमान्जी, लक्ष्मणजी एवं भरतजीने भी जाना है। यह कहनेमें सुगम है, किन्तु करनेमें बड़ी ही अगम है और सुननेमें भी बड़ी मीठी जान पड़ती है ॥ १ ॥ इसे चाहते तो सब हैं, परन्तु प्राप्त कोई विरले ही करते हैं; फिर भी यह युग-युगमें जगमगाती रहती है। यह रामप्रेमके मार्गसे कभी विलग नहीं होती और न कभी डगमगाती ही है ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, जिसके बिना ऋद्धि-सिद्धि और [सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य एवं सार्टिरूप] चार प्रकारकी सुगतियाँ गतिरूप होकर भी अगति ही हैं, उस भक्तिके सम्मुख हुए बिना विषयरूप अविद्या ठगती ही रहती है ॥ ३ ॥ राग गौरी [ ८३ ] कैकयी करी धौं चतुराई कौन ? राम-लषन-सिय बनहि पठाए, पति पठाए सुरभौन ॥ १ ॥ कहा भलो धौं भयो भरतको, लगे तरुन-तन दोन ॥ पुरबासिन्हके नयन नीर बिनु कबहुँ तो देखति हौं न ॥ २ ॥ कौसल्या दिन राति बिसूरति, बैठि मनहि मन मौन । तुलसी उचित न होइ रोइबो, प्रान गए संग जौ न ॥ ३ ॥ [कौसल्याजी कहती हैं—] 'कैकेयीने भला क्या चतुराई की ? व्यर्थ राम, लक्ष्मण और सीताको वनमें भेजा और पतिको देवलोक पहुँचा दिया ! ॥ १ ॥ इससे भरतका भी क्या भला हुआ ? तरुण अवस्थामें ही उसके शरीरमें (विरहरूप) दावाग्नि लग गयी, इसके सिवा पुरवासियोंके नेत्र भी मुझे कभी अश्रुहीन दिखायी नहीं
देतें' ॥ २ ॥ इस प्रकार कौसल्याजी दिन-रात चुपचाप बैठी मन- ही-मन खिन्न होती रहती हैं और सोचती हैं कि यदि हमारे प्राण रामके साथ नहीं गये तो रोना तो हमें उचित है नहीं ॥ ३ ॥ [ ८४ ] हाथ मींजिबो हाथ रह्यो । लगौ न संग चित्रकूटहुतें, ह्याँ कहा जात बह्यो ॥ १ ॥ पति सुरपुर, सिय-राम-लषन बन, मुनिव्रत भरत गह्यो । हौं रहि घर मसान-पावक ज्यों मरिबोइ मृतक दह्यो ॥ २ ॥ मेरोइ हिय कठोर करिबे कहँ बिधि कहुँ कुलिस लह्यो । तुलसी बन पहुँचाइ फिरी सुत, क्यौं कछु परत कह्यो ? ॥ ३ ॥ [कौसल्याजी सोचती हैं—] 'मेरे हाथ तो हाथ मलना ही लगा है। भला मेरे बिना यहाँ क्या बहा जाता था (क्या नष्ट हो रहा था) जो मैं चित्रकूटसे भी रामके साथ नहीं लगी ॥ १ ॥ पति सुरलोक सिधार गये; राम, लक्ष्मण और सीता वनमें जा बसे और भरतने भी मुनिव्रत धारण कर लिया, किन्तु मैं श्मशानकी अग्निके समान घरमें ही रह गयी; मैंने तो मानो मृत्युरूप मृतकको ही जला डाला है [ अतः अब मुझे मौत भी नहीं आ सकती ] ॥ २ ॥ विधाताको मेरा ही हृदय कठोर बनानेके लिये कहीं वज्र मिल गया था [अर्थात् मेरा हृदय बनाते समय ब्रह्माकी दृष्टिमें वज्र था, वह उससे भी कोई कठोर वस्तु बनाना चाहता था, फलस्वरूप उसने मेरा हृदय बनाया। तात्पर्य यह कि मेरा हृदय वज्रसे भी कठोर है]। हाय ! मैं पुत्रको वनमें पहुँचाकर लौट आयी। ऐसी अवस्थामें कोई बात कैसे कही जा सकती है?' ॥ ३ ॥
२६३ अयोध्याकाण्ड राग सोरठ [ ८५ ] हौं तो समुझि रही अपनो सो । राम-लषन-सियको सुख मोकहँ भयो, सखी ! सपनो सो ॥ १ ॥ जिनके बिरह-बिषाद बँटावन खग-मृग जीव दुखारी । मोहि कहा सजनी समुझावति, हौं तिन्हकी महतारी ॥ २ ॥ भरत-दसा सुनि, सुमिरि भूपगति, देखि दीन पुरबासी । तुलसी 'राम' कहति हौं सकुचति, ह्वैहै जग उपहाँसी ॥ ३ ॥ 'सखि ! मैं तो अपनी-सी बात समझती हूँ । अरी ! मेरे लिये तो राम, लक्ष्मण और सीताका सुख स्वप्नके समान हो गया ॥ १ ॥ जिनकी विरहव्यथाको बँटानेके लिये आज पशु-पक्षी आदि सभी जीव दुखी हो रहे हैं, अरी सजनी ! उनके विषयमें मुझे क्या समझाती है। मैं तो उनकी माता हूँ ॥ २ ॥ भरतकी दशा सुनकर, महा- राजकी गति स्मरण कर और पुरवासियोंको दीन देखकर मैं तो 'राम' कहनेमें भी सकुचाती हूँ, क्योंकि इससे संसारमें मेरी हँसी होगी [कि देखो, इन दूरके सम्बन्धियोंकी ऐसी दुर्दशा है और स्वयं माता होकर यह जीवन धारण कर रही है] ॥ ३ ॥ [ ८६ ] आली ! हौं इन्हहि बुझावौं कैसे ? लेत हिये भरि भरि पतिको हित, मातुहेतु सुत जैसे ॥ १ ॥ बार बार हिहिनात हेरि उत, जो बोलै कोउ द्वारे । अंग लगाइ लिए बारेतें करुनामय सुत प्यारे ॥ २ ॥ लोचन सजल, सदा सोवत-से, खान-पान बिसराए । चितवत चौंकि नाम सुनि, सोचत राम-सुरति उर आए ॥ ३ ॥
गीतावली २६४ तुलसी प्रभुके विरह बधिक हठि राजहंस-से जोरे। ऐसेहु दुखित देखि हौं जीवति राम-लखनके घोरे॥ ४ ॥ 'अरी सखि! मैं इन घोड़ोंको कैसे समझाऊँ! देख, जैसे माताके लिये पुत्र व्याकुल रहता है उसी प्रकार इनके हृदयमें बारम्बार अपने स्वामी रामकी प्रीति उमड़ आती है॥ १॥ यदि कोई द्वारपर बोलता है तो ये बारम्बार उसी ओर देखकर हिनहिनाने लगते हैं, क्यों? इन्हें मेरे उन करुणामय प्रिय पुत्रोंने बालकपनसे ही अपने-से हिला- मिला लिया था॥ २॥ इनके नेत्र सदा आँसुओंसे भरे रहते हैं और ये खान-पानको भूलकर सदा सोये हुए से रहते हैं। ये रामका नाम सुनते ही चौंक पड़ते हैं और हृदयमें उनका स्मरण आते ही शोकग्रस्त हो जाते हैं॥ ३॥ ये राम-लक्ष्मणके घोड़े राजहंसोंके जोड़ेके समान हैं, हाय! इन्हें प्रभुके वियोगरूप वधिकसे इस प्रकार हठपूर्वक व्यथित होते देखकर भी मैं जी रही हूँ? ॥ ४॥ [ ८७ ] राघौ! एक बार फिरि आवौ। ए बर बाजि बिलोकि आपने, बहुरौ बन ह सिधावौ॥ १ ॥ जे पय प्याइ, पोखि कर-पंकज, बार बार चुचुकारे। क्यों जीवहिं, मेरे राम लाड़िले! ते अब निपट बिसारे॥ २ ॥ भरत सौगुनी सार करत हैं, अति प्रिय जानि तिहारे। तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे, मनहु कमल हिम-मारे॥ ३ ॥ सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन, कहियो मात-सँदेसो। तुलसी मोहि और सबहिनतें इन्हको बड़ो अंदेसो॥ ४ ॥
२६५ अयोध्याकाण्ड 'हे राघव ! तुम एक बार तो अवश्य लौट आओ। यहाँ अपने इन श्रेष्ठ घोड़ोंको देखकर फिर वनमें चले जाना ॥ १ ॥ जिन्हें तुमने दूध पिलाकर, अपने ही करकमलोंसे पुष्टकर बारम्बार पुचकारा था, ऐ मेरे लाड़िले राम ! वे अब एकाएकी भूल जानेसे कैसे जीवित रह सकेंगे ! ॥ २ ॥ तुम्हारे अत्यन्त प्रिय जानकर यद्यपि भरतजी इनकी सौगुनी सँभाल रखते हैं, तो भी पालेके मारे हुए कमलके समान ये दिन-दिन दुर्बल होते जा रहे हैं ॥ ३ ॥ अरे पथिको ! सुनो, यदि तुम्हें वनमें राम मिल जायें तो तुम उनसे माताका यही सन्देश कहना कि मुझे सबसे बढ़कर इन घोड़ोंकी ही चिन्ता है' ॥ ४ ॥ राग केदारा [ ८८ ] काहूसों काहू समाचार ऐसे पाए। चित्रकूटतें राम-लषन-सिय सुनियत अनत सिधाए ॥ १ ॥ सैल, सरित, निरझर, बन, मुनि-थल देखि-देखि सब आए। कहत सुनत सुमिरत सुखदायक, मानस-सुगम सुहाए ॥ २ ॥ बढ़ अवलंब वाम-विधि विघटित बिषम बिषाद बढ़ाए। सिरिस-सुमन-सुकुमार मनोहर बालक बिंध्य चढ़ाए ॥ ३ ॥ अवध सकल नर-नारि बिकल अति, अकनि बचन अनभाए। तुलसी राम-बियोग-सोग-बस, समुझत नहि समुझाए ॥ ४ ॥ किसीसे किसीने ऐसी खबर पायी है कि राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूटसे कहीं अन्यत्र चले गये—ऐसी सुना जाता है ॥ १ ॥
गीतावली २६६ वे कहते थे कि वहाँके पर्वत, नदी, झरने, वन और मुनियोंके निवासस्थान—ये सब हम देख आये हैं। वे सब कहने, सुनने और स्मरण करनेमें भी सुखदायक हैं तथा मनको भी बड़े सुगम और प्रिय जान पड़ते हैं ॥ २ ॥ इसपर कोई अन्य नागरिक कहने लगे— 'देखो, वाम विधाताने (यौवराज्यरूप) बड़े अवलम्बको तोड़कर यह विषम विषाद बढ़ा दिया कि जो मनोहर बालक सिरस-सुमनके समान सुकुमार थे, उन्हें विन्ध्याचलपर चढ़ना पड़ा' ॥ ३ ॥ वे अप्रिय वचन सुनकर अयोध्याके सब नर-नारी अत्यन्त विकल हो गये। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय वे रामकी विरहव्यथाके कारण समझानेसे भी नहीं समझते थे ॥ ४ ॥ [ ८९ ] सुनी मैं सखि ! मंगल चाह सुहाई। सुभ पत्रिका निषादराजकी आजु भरत पहँ आई ॥ १ ॥ कुँवर सो कुसल-छेम अलि ! तेहि पल कुलगुर कहँ पहुँचाई। गुर कृपालु संभ्रम पुर घर घर सादर सबहि सुनाई ॥ २ ॥ बधिबिराध, सुर-साधु सुखी करि, ऋषि-सिख-आसिष पाई। कुंभज-सिष्य समेत संग सिय, मुदित चले दोउ भाई ॥ ३ ॥ बीच बिंध्य रेवा सुपास थल बसे हैं परन-गृह छाई। पंथ-कथा रघुनाथ पथिककी तुलसिदास सुनि गाई ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! मैंने एक मङ्गलमय शुभ समाचार सुना है। आज भरतजीके पास निषादराजकी एक शुभपत्रिका आयी है ॥ १ ॥ हे आली ! वह कुशलक्षेम-पत्रिका कुँवर भरतजीने तुरन्त
२६७ अरण्यकाण्ड ही कुलगुरु वसिष्ठजीके पास भेज दी थी और कृपालु गुरुजीने उसे हर्ष और आदरके सहित नगरमें घर-घर सबको सुनाया है ॥ २ ॥ [उसमें लिखा है कि] दोनों भाई विराधका वध कर देवता और साधु पुरुषोंको आनन्दित कर, ऋषियोंसे उपदेश और आशीर्वाद पाइ अगस्त्यजीके शिष्य सुतीक्ष्णके साथ सीताजीके सहित आनन्दपूर्वक आगे चले गये हैं ॥ ३ ॥ और इस समय विन्ध्याचल और रेवा (नर्मदा) नदीके बीचमें एक सुभीतेके स्थानपर पत्तोंकी कुटी बना- कर बसे हुए हैं ।' तुलसीदासने भी रघुनाथ बटोहीकी यह पन्थकथा [गुरु और पुराणादिसे] सुनकर गायी है ॥ ४ ॥ अरण्यकाण्ड भगवान्का वन-विहार राग मलार [ १ ] देखे राम पथिक नाचत मुदित मोर । मानत मनहु सतड़ित ललित घन, धनु सुरधनु, गरजनि टंकार ॥१॥ कँपै कलाप बर बरहि फिरावत, गावत कल कोकिल-किसोर । जहँ जहँ प्रभु बिचरत, तहँ तहँ सुख, दंडकबन कौतुक न थोर ॥२॥ सघन छांह-तम रुचिर रजनि भ्रम, बदन-चंद चितवत चकोर । तुलसी मुनि खग-मृगनि सराहत, भए हैं सुकृत सब इन्हकी ओर ॥३॥
गीतावली २६८ पथिक रामको देखकर मयूर आनन्दित होकर नाचते हैं। वे सीतारामको देखकर मानो उन्हें बिजलीसहित सुन्दर मेघ समझते हैं तथा उनके धनुषको इन्द्रधनुष और उसके टंकारको मेघकी गर्जन जानते हैं ॥ १ ॥ सुन्दर-सुन्दर मोर अपने पिच्छसमूहको हिलाते हुए नाचते हैं और कोकिलशावक सुमधुर गान करते हैं। प्रभु जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहीं-वहीं आनन्द दिखाया पड़ता है, इस प्रकार दण्डक वनमें कुछ कम कुतूहल नहीं है ॥ २ ॥ सघन वृक्षोंकी छायाके अन्धकारमें चाँदनी रातका भ्रम हो जानेसे चकोर प्रभुके मुखरूप चन्द्रमाकी ओर निहारने लगता है। तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय मुनिजन भी पशु-पक्षियोंकी सराहना करते हैं और कहते हैं कि सारे सुकृत इन्हींके पक्षमें हैं ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ २ ] सुभग सरासन सायक जोरे। खेलत राम फिरत मृगया बन, बसति सो मृदु मूरति मन मोरे ॥१॥ पीत बसन कटि, चारु चारि सर, चलत कोटि नट सो तृन तोरे। स्यामल तनु श्रम-कन राजत, ज्यों नव घन सुधा-सरोवर खोरे ॥२॥ ललित कंध, बर भुज, बिसाल उर, लेहिं कंठ-रेखें चित चोरे। अवलोकत मुख देव परम सुख, लेत सरद-ससिकी छबि छोरे ॥३॥ जटा मुकुट सिर, सारस-नयननि गौहैं तकत सुभौंह सकोरे। सोभा अमित समाति न कानन, उमगि चली चहुँ दिसि मिति फोरे ॥४॥ चितवत चकित कुरंग-कुरंगिनि, सब भए मगन मदनके भोरे। तुलसिदास प्रभु बान न मोचत सहज सुभाय प्रेमबस थोरे ॥५॥
२६६ अरण्यकाण्ड भगवान् राम अपने सुन्दर धनुषपर बाण चढ़ाये वनमें मृगया खेलते फिर रहे हैं। वह मधुर मूर्ति मेरे हृदयमें निवास करती है ॥ १ ॥ उनकी कमरमें पीताम्बर और अति सुन्दर चार बाण हैं। उनकी चालको देखकर करोड़ों नट (नृत्यकार) मुग्ध होकर तण्ह तोड़ते हैं, [जिससे उस चालपर नजर न लगे]। प्रभुके श्याम शरीर- पर पसीनेकी बूंदें ऐसी शोभायमान हैं जैसे कोई नवीन मेघ अमृतके सरोवरमें डुबकी लगाकर निकला हो ॥ २ ॥ प्रभुके कन्धे बड़े सुन्दर हैं, भुजाएँ मनोहर हैं, वक्षःस्थल विशाल है और कण्ठकी रेखाएँ तो चित्तको चुराये लेती हैं। भगवान्का मुख देखनेसे बड़ा ही आनन्द देता है और मानो शरच्चन्द्रकी छबिको छीन लेता है ॥ ३ ॥ प्रभुके सिरपर जटाओंका मुकुट है और जिस समय वे भौंहें सिकोड़कर अपने नयनकमलोंसे निशानेकी ओर ताकते हैं, उस समयकी अपार सोभा तो सारे वनमें भी नहीं समाती; वह मर्यादा छोड़कर मानो चारों दिशाओंमें उमड़कर फैल जाती है ॥ ४ ॥ उस समय मृग और मृगी भी चकित होकर उन्हींकी ओर देखने लगते हैं, मानो सब-के-सब प्रभुको कामदेव समझकर मोहित हो गये हैं। तुलसीदास कहते हैं, किन्तु उस समय प्रभु बाण नहीं छोड़ते, क्योंकि वे स्वभावसे ही थोड़े-से प्रेमके भी वशीभूत हो जानेवाले हैं ॥ ५ ॥ मारीच-वध राग सोरठ [ ३ ] बैंठे हैं राम-लखन अरु सीता। पंचबटी बर परनकुटी तर, कहैं कछु कथा पुनीता ॥ १ ॥
गीता० २७० कपट-कुरंग कनकमनिमय लखि प्रियसों कहति हँसि बाला । आए पालिबे जोग मंजु मृग, मारेहु मंजुल छाला ॥ २ ॥ प्रिया-वचन सुनि बिहँसि प्रेमबस गवहिं चाप-सर लीन्हें । चल्यो भाजि, फिरि फिरि चितवत मुनिमख-रखवारे चीन्हें ॥ ३ ॥ सोहति मधुर मनोहर मूरति हेम हरिनके पाछे । धावनि, नवनि, बिलोकनि, बिनकनि बसे तुलसी उर आछे ॥ ४ ॥ पञ्चवटीमें सुन्दर पर्णकुटीके भीतर राम, लक्ष्मण और सीता बैठे हुए हैं और आपसमें कुछ पवित्र कथाएं कह रहे हैं ॥ १ ॥ इतनेमें ही एक सुवर्ण और मणिमय कपटमृगको देखकर सीताजीने अपने प्रियतमसे हँसकर कहा—'यह मनोहर मृग यदि पकड़ लिया जाय तो पालनेयोग्य है और यदि मारा भी जाय तो भी इसकी मृगछाला बड़ी सुन्दर है' ॥ २ ॥ प्राणप्रियाके ये वचन सुन हँसकर श्रीरघुनाथजीने उसके प्रेमवश धीरेसे हाथमें धनुष-बाण लिये । उन्हें देखकर वह मृग बार-बार पीछेको देखता हुआ दौड़ चला; उसने विश्वामित्र मुनिके यज्ञकी रक्षा करनेवाले भगवान् रामको पहचान लिया ॥ ३ ॥ सुवर्णमय मृगके पीछे भगवान्की अतिशय मधुर और मनोहर मूर्ति बड़ी शोभायमान जान पड़ती है । उस समयका प्रभुका दौड़ना, झुकना, देखना और थककर खड़ा रह जाना तुलसीदासके हृदयमें अच्छी तरह बसा हुआ है ॥ ४ ॥ राग कल्याण [ ४ ] कर सर-धनु, कटि रुचिर निषंग । प्रिया-प्रीति-प्रेरित बन-बीथिन्ह बिचरत कपट-कनक-मृग संग ॥१॥
२७१ अरण्यकाण्ड भुज बिसाल, कमनीय कंध-उर, श्रम-सीकर सोहैं साँवरे अंग। मनु मुकुता मनि मरकतगिरिपर लसत ललित रबि-किरनि प्रसंग ॥२॥ नलिन नयन, सिर जटा-मुकुट, बिच सुमन-माल मनु सिव-सिर गंग। तुलसिदास ऐसी मूरतिकी बलि, छबि बिलोकि लाजैं अमित अनंग ॥३॥ प्रभुके हाथमें धनुष-बाण हैं और कमरमें मनोहर तरकस है। प्रियाकी प्रीतिसे प्रेरित होकर वे वन्यमार्गोंमें कपटमय कनकभृगके साथ-साथ डोल रहे हैं ॥ १ ॥ उनकी भुजाएँ विशाल हैं, कन्धे और वक्षःस्थल सुन्दर हैं तथा साँवले शरीरपर पसीनेकी बूंदें शोभायमान हैं। मानो मरकतमणिके पर्वतपर मनोहर सूर्यकिरणोंका संग पाकर मोती सुशोभित हो रहे हैं ॥ २ ॥ प्रभुके कमलके समान नेत्र हैं, सिरपर जटाओंका मुकुट है और उसके बीचमें पुष्पोंकी माला गूंथी हुई है, जैसे शिवजीके मस्तकपर गङ्गाजी विराजमान हों। तुलसी- दास ऐसी मूर्तिपर बलिहारी है, जिसकी छविको देखकर अनन्त कामदेव भी लज्जित हो जाते हैं ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ५ ] राघव, भावति मोहि बिपिनकी बीथिन्ह धावनि। अरुन-कंज-बरन चरन सोकहरन, अंकुस-कुलिस-केतु-अंकित अवनि ॥१॥ सुंदर स्यामल अंग, बसन पीत सुरंग, कटि निषंग परिकर मेरवनि। कनक-कुरंग संग, साजे कर सर-चाप, राजिवनयन इत उत चितवनि ॥२॥ सोहत सिर मुकुट जटा-पटल-निकर, सुमन-लता सहित रची बनवनि। तैसेई श्रम-सीकर रुचिर राजत मुख, तैसिए ललित भृकुटिन्हकी नवनि ॥३॥
गीतावली २७२ देखत खग-निकर, मृग रवनिन्हजुत, थकित बिसारि जहाँ तहाँकी भँवनि । हरि-दरसन-फल पायो है ग्यान बिमल, जांचत भगति, मुनि चाहत जवनि ॥४॥ जिन्हके मन मगन भए हैं रस सगुन, तिन्हके लेखे अगुन मुकुति कवनि। श्रवन-सुखकरनि, भवसरिता-तरनि, गावत तुलसिदास कीरति पवनि ॥५॥ हे राघव ! मुझे आपका वनकी वीथियों दौड़ना बड़ा प्रिय जान पड़ता है, जिससे वहाँकी पृथिवी आपके अरुणकमलवर्ण शोक- हारी चरणोंके अंकुश, वज्र एवं ध्वजा आदि चिह्नोंसे अङ्कित हो रही है ॥ १ ॥ अति सुन्दर श्याम शरीरपर रँगीला पीताम्बर धारण करना, कमरमें तरकस और फेंटा बाँधना, सुवर्णमृगके साथ हाथमें धनुष-बाण लिये दौड़ना, नेत्रकमलोंसे इधर-उधर निहारना ॥ २ ॥ तथा सिरपर पुष्प और लताओंके सहित जटाजूटके मुकुटकी रचना—ये सब बड़े ही शोभायमान जान पड़ते हैं । इसी प्रकार आपके मनोहर मुखारविन्दपर पसीनेके बूँदें शोभाय- मान हैं और उसी तरह मनोहर भ्रुकुटियोंका झुकाव भी है ॥ ३ ॥ उस समय पक्षिसमूह तथा मृगियोंके सहित मृग प्रभुकी सुन्दरता देखकर थकित हो जाते हैं और जहाँ-के-तहाँ भ्रमण करना छोड़ देते हैं। इन्हें प्रभुके दर्शनोंका फलस्वरूप निर्मल ज्ञान तो मिल गया है, अब जिसे मुनिजन भी चाहते हैं, उस अहैतुकी भक्तिकी याचना और करते हैं ॥ ४ ॥ भला जिनके चित्त सगुण- स्वरूपके रसमें डूबे हुए हैं, उनके लिये गुणहीन मुक्ति क्या चीज
२७३ अरण्यकाण्ड है ? तुलसीदास तो प्रभुकी श्रवणसुखदायिनी, संसारसरिन्नित्तारिणी पवित्र कीर्तिका ही गान करता है ॥ ५ ॥ राग सोरठा [ ६ ] रघुबर दूरि जाइ मृग मारयो । लखन पुकारि, राम हरुए कहि, मरतहु बैर सँभारयो ॥ १ ॥ सुनहु तात ! कोउ तुम्हहि पुकारत प्राननाथको नाईं । कह्यो लषन, हत्यो हरिन, कोपि सिय हठि पठयो बरि आईँ ॥ २ ॥ बंधु बिलोकि कहत तुलसी प्रभु 'भाई ! भली न कीन्हीं । मेरे जान जानकी काहू खल छल करि हरि लीन्हीं' ॥ ३ ॥ रघुनाथजीने बड़ी दूर जाकर उस मृगका वध किया। उसने 'हा लक्ष्मण !' ऐसा जोरसे पुकारकर, धीरेसे 'राम' कहा और इस प्रकार मरते समय भी अपनी पूर्व-शत्रुताको याद रक्खा ॥ १ ॥ [तब सीताजीने कहा-] 'लक्ष्मण ! सुनो, तुम्हें प्राणनाथ प्रभु रामके समान कोई पुकार रहा है।' तब लक्ष्मणजीने कहा- 'कुछ नहीं, हरिण मारा गया है।' इसपर सीताजीने कुपित होकर उन्हें हठपूर्वक बलात् भेज दिया ॥ २ ॥ उस समय भाईको आता देख तुलसीदास- के प्रभु भगवान् राम कहने लगे- 'भैया ! तुमने अच्छा नहीं किया; मेरे विचारसे तो किसी दुष्टने इस प्रकार छल करके जानकीको हर लिया है' ॥ ३ ॥ सीता-हरण [ ७ ] आरत बचन कहति बैदेही । बिलपति भूरि बिसूरि 'दूरि गए मृग सँग परम सनेही ॥ १ ॥ गी० १८-
कहे कटु बचन, रेख नाँघी मैं, तात छमा सो कीजै। देखि बधिक-बस राजमरालिनि, लषनलाल ! छिनि लीजै ॥ २ ॥ बनदेवनि सिय कहन कहति यों छल करि नीच हरी हौं। गोमर-कर सुरधेनु, नाथ ! ज्यों त्यों पर-हाथ परी हौं ॥ ३ ॥ तुलसिदास रघुनाथ-नाम-धुनि अकनि गीध धुनि धायो। 'पुत्रि पुत्रि ! जनि डरहि, न जैहै नीचु, मीचु हौं आयो' ॥ ४ ॥ [लक्ष्मणजीके चले जानेपर रावण यतिवेष धारण कर पञ्चवटी- में आया और भिक्षाके मिससे सीताजीको पास बुला, उन्हें रथपर बिठाकर ले चला।] उस समय सीताजी आर्त वचन कहने लगीं और 'हाय ! परमप्रिय भगवान् राम मृगके साथ न जाने कितनी दूर निकल गये' ऐसा कहकर बहुत दुःख करके रोने लगीं ॥ १ ॥ 'लषणलाल ! मैंने तुमसे कठोर वचन कहे और तुम्हारी खींची हुई रेखाको लाँघा, सो हे तात ! तुम क्षमा करो और इस समय इस राजहंसीको बधिकके हाथमें पड़ी देखकर उससे छीन लो' ॥ २ ॥ फिर वनदेवताओंसे वे इस प्रकार संदेशा कहने लगीं-[तुम भगवान् रामसे कहना कि ] 'मुझे नीच रावणने छल करके हर लिया है। हे नाथ ! कसाईके हाथ जैसे कामधेनु पड़ जाय, उसी प्रकार इस समय मैं शत्रुके हाथमें पड़ गयी हूँ' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समय सीताजीके मुखसे रघुनाथजीके नामकी ध्वनि सुनकर गृध्रराज क्रुद्ध होकर दौड़ा और बोला-'बेटी! डर मत। अब यह नीच बचकर नहीं जा सकता, उसका कालरूप मैं आ गया हूँ' ॥ ४ ॥ जटायु-वध [ ८ ] फिरत न बारहि बार प्रचारचो। चपरि चोंच-चंगुल हय हति, रथ खंड खंड करि डारचो ॥ १ ॥