गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३५ अयोध्याकाण्ड कौसल्याके बिरह-बचन सुनि रोइ उठीं सब रानी । तुलसिदास रघुबीर-बिरहकी पीर न जाति बखानी ॥ ४ ॥ [माता कौसल्या कहती हैं—] 'अरी मैया ! मुझे कोई नहीं समझाता । मुझे अभीतक विश्वास नहीं होता कि रामका वनगमन सत्य है या कोई स्वप्न हुआ है ॥ १ ॥ राम, लक्ष्मण और सीता मेरे नेत्रोंके सामने सदा लगे ही रहते हैं, तो भी विधाता ऐसा विपरीत हो गया है कि इस हृदयका दाह दूर ही नहीं होता ॥ २ ॥ रघुनाथजीके देखनेपर तो दुःख नहीं रह सकता और बिना देखे शरीरका रहना असम्भव है। किन्तु मेरे प्राणोंने अभीतक कूच नहीं किया; अतः सखि ! सुनो, इस नियममें अवश्य कोई गड़बड़ हुई है ॥ ३ ॥ कौसल्याजीके ये विरहवाक्य सुनकर सब रानियाँ रो पड़ीं । तुलसीदास कहते हैं, रघुनाथजीके विरहकी व्यथाका वर्णन नहीं हो सकता ॥ ४ ॥ [ ५४ ] जब जब भवन बिलोकति सूनो । तब तब बिकल होति कौसल्या, दिनदिन प्रति दुख दूनो ॥ १ ॥ सुमिरत बाल-बिनोद रामके सुंदर मुनि-मन-हारी । होत हृदय श्रति सूल समुझि पदपंकज श्रजिर-बिहारी ॥ २ ॥ को अब प्रात कलेऊ मांगत रूठि चलैगो, माई ! स्याम-तामरस-नेन स्रवत जल काहि लेउँ उर लाई ॥ ३ ॥ जीवौं तौ बिपति सहौं निसिबासर, मरौं तौ मन पछितायो । चलत बिपिन भरि नयन रामको बदन न देखन पायो ॥ ४ ॥ तुलसिदास यह दुसह दसा श्रति, दारुन बिरहु घनेरो । दूरि करै को भूरि कृपा बिनु सोकजनित रुज मेरो ? ॥ ५ ॥