गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २३४ कबहुँ कहति यों, बड़ी बार भइ, जाहु भूप पहँ, भैया। बंधु बोलि जेँइय जो भावै, गई निछावरि मैया ॥ ३ ॥ कबहुँ समुझि बन-गवन रामको रहि चकि चित्र लिखी-सी। तुलसिदास वह समय कहेतें लागत प्रीति सिखी-सी ॥ ४ ॥ माता रघुनाथजीके खेल-कूदके धनुषको देखती हैं और प्रभुजी- की जो नन्ही-नन्ही सुन्दर जूतियाँ उन्हें बारम्बार हृदय और नेत्रोंसे लगाती हैं ॥ १ ॥ कभी पहलेकी भाँति सबेरे ही मन्दिरमें जाकर इस प्रकारके प्रिय वचन कहकर जगाने लगती हैं कि, 'हे तात ! उठो, मुखचन्द्रपर माता बलिहारी जाती है, देखो, सारे अनुज और सखा- गण द्वारपर खड़े हैं, ॥ २ ॥ और कभी कहती हैं—'भैया ! बहुत विलम्ब हो गया है, महाराजके पास जाओ और अपने साथियोंको बुलाकर जो रुचे सो भोजन करो, माता निछावर होती है' ॥ ३ ॥ तथा कभी रामका वनगमन स्मरण कर चकित होकर चित्रलिखित- सी रह जाती है। तुलसीदास कहते हैं, उस समयका वर्णन करनेसे तो प्रीति सीखी हुई-सी जान पड़ती है [क्योंकि सत्य प्रेम होनेपर तो उसका वर्णन ही नहीं हो सकेगा, चित्त विवश होकर विरहाग्निमें दग्ध हो जायगा] ॥ ४ ॥ [ ५३ ] माई री ! मोहि कोउ न समुझावै। राम-गवन साँचो किधौं सपनो, मन परतीति न आवै ॥ १ ॥ लगेइ रहत मेरे नैननि आगे राम-लषन अरु सीता। तदपि न मिटत दाह या उरकी, बिधि जो भयो बिपरीता ॥ २ ॥ दुख न रहै रघुपतिहि बिलोकत तनु न रहै बिनु देखे। करत न प्रान पयान, सुनहु सखि ! अरुझि परी यहि लेखे ॥ ३ ॥