भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 242

गीतावली २३६ माता कौसल्या जब-जब घरको सूना देखती हैं तब-तब व्याकुल हो जाती हैं। उन्हें दिन-दिन दूना दुःख हो रहा है ॥ १ ॥ वह भगवान् रामके मुनिमनहारी बालविनोदोंको याद करती हैं और (उनके) सुकुमार चरणकमलोंको राजमन्दिरके आंगनमें ही विचरनेवाले समझकर उनके हृदयमें बड़ी पीड़ा होती है ॥ २ ॥ [वे कहने लगती हैं-] अरी मैया ! अब प्रातःकाल होते ही कलेवा मांगकर [ उसमें देरी होनेपर ] कौन रूठकर भागेगा और श्यामकमलसदृश नेत्रोंसे जल बहते देखकर मैं किसे हृदयसे लगाऊँगी ! ॥ ३ ॥ अब मैं जीऊँगी तो रात-दिन दुःख सहना पड़ेगा और यदि मर गयी तो हृदयमें यह पश्चात्ताप रह जायगा कि 'वनको जाते समय मैं नेत्र भरकर रामका मुख भी न देख सकी' ॥ ४ ॥ यह दशा बड़ी ही दुःसह है, बड़ा ही कठोर विरह है, ऐसा कौन है जो अत्यन्त कृपाके बिना मेरी इस शोकजनित पीड़ा- को दूर कर सके ॥ ५ ॥ [ ५५ ] मेरो यह अभिलाषु बिधाता । कब पुरवै सखि सानुकूल ह्वै हरि सेवक-सुखदाता ॥ १ ॥ सीता-सहित कुसल कोसलपुर आवत हैं सुत दोऊ । श्रवन-सुधा-सम बचन सखी कब आइ कहैगो कोऊ ? ॥ २ ॥ सुनि संदेस प्रेम-परिपूरन संभ्रम उठि धावोंगी । बदन बिलोकि रोकि लोचन-जल हरषि हिये लावोंगी ॥ ३ ॥ जनकसुता कब सासु कहैं मोहि, राम लखन कहैं मैया । बाहु जोरि कब अजिर चलहिंगे स्याम-गौर दोउ भैया ॥ ४ ॥ तुलसिदास यहि भाँति मनोरथ करत प्रीति अति बढ़ी । थकित भई उर आनि राम-छबि मनहु चित्र लिखि काढ़ी ॥ ५ ॥