गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३१ अयोध्याकाण्ड वनमें [नवीन कोंपलें उत्पन्न कर] कोई नया नगर बसाया हो ॥ २ ॥ उन मदन महाराजका राजसिंहासन पर्वतकी सुन्दर शिला है, वनकी शोभा रति है, मृगगण कुटुम्बी हैं, पुष्ट श्वेतच्छत्र हैं, लताएँ वितान हैं, वायु चमर है और झरने नौबत हैं ॥ ३ ॥ ऐसा जान पड़ता है मानो चैत्र और वैशाख—ये दोनों धीर-वीर सेनापति हैं, अनेकों सुन्दर वृक्ष उनके दृढ़प्रतिज्ञ वीर हैं तथा भौंरे शुक और कोकिल पक्षी वन्दीजन हैं, जो अनेकों छन्दोंमें उनका विशुद्ध यश बखान करते हैं ॥ ४ ॥ पृथ्वीपर जो फूलोंके रस, पराग अथवा फल गिरते हैं, वे मानो अन्य सामन्तगण उन्हें कर देते हैं । इस प्रकार नीतिनिपुण कामदेवने अपने मन्त्री कलियुगके सहित मानो साम, दाम, दण्ड, भेद—चारों प्रकारसे सारे विश्वको अपने अधीन कर लिया है ॥ ५ ॥ इसके राज्यमें विरही पुरुषोंपर नित्य नयी मार पड़ती है तथा सिद्ध और साधकोंको ललकारकर दण्ड दिया जाता है। तुलसीदास कहते हैं, किन्तु जो श्रीरघुनाथजीकी बाँहके नीचे बसे हुए (शरणागत) हैं, उनकी तो छायाको भी यह कामदेव नहीं छू सकता ॥ ६ ॥ राग मलार [ ५० ] सब दिन चित्रकूट नीको लागत । बरषाऋतु प्रबेस बिसेष गिरि देखन मन अनुरागत ॥ १ ॥ चहुँदिसि बन संपन्न बिहँग-मृग बोलत सोभा पावत । जनु सुनरेस देस-पुर प्रमुदित प्रजा सकल सुख छावत ॥ २ ॥ सोहत स्याम जलद मृदु घोरत धातु रँगभगे सृँगनि । मनहु आदि अंभोज बिराजत सेवित सुर-मुनि-भृंगनि ॥ ३ ॥