गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली . २३० रंग छिड़कता हुआ विराजमान हो ॥ ४ ॥ इसने खेलनेमें ही देवता, असुर और नाग आदिको जीत लिया है तथा यह हठपूर्वक सिद्ध- मुनीश्वरोंके मार्गमें रोड़े अटकाये हुए है । तुलसीदास कहते हैं—यह कामदेव तो उसीको छोड़ता है, जिसकी कमलनयन भगवान् राम रक्षा करते हैं ॥ ५ ॥ [ ४९ ] ऋतु-पति आए भलो बन्यो बनसमाज । मानो भए हैं मदन महाराज आज ॥१॥ मनो प्रथम फागु मिस करि अनीति । होरीमिस अरिपुर जारि जीति ॥ मारुत मिस पत्र-प्रजा उजारि । नयनगर बसाए बिपिन झारि ॥२॥ सिंहासन सैल-सिला सुरंग । कानन-छबि रति, परिजन कुरंग ॥ सित छत्रसुमन, बल्ली बितान । चामर समीर निरझर निसान ॥३॥ मनो मधु-माधव दोउ अनिप धीर । बर बिपुल बिटप बानैत बीर ॥ मधुकर-सुक-कोकिल बंदि-बृंद । बरनहिं बिसुद्ध जस बिबिध छंद ॥४॥ महि परत सुमन-रस फल पराग । जनु देत इतर नृप कर-बिभाग ॥ कलि सचिव सहित नय-निपुन मार । कियो बिस्व बिबस चारिहु प्रकार ॥५॥ बिरहिनपर नित नई परै मारि । डाँड़ियत सिद्ध-साधक प्रचारि ॥ तिनकीन काम सकै चापि छाँह । तुलसी जे बसहि रघुबीर बाँह ॥६॥ ऋतुराजके आनेपर वनकी शोभा बड़ी भली बन गयी है, मानो आज कामदेवको महाराज-पद प्राप्त हुआ हो ॥ १ ॥ अतः उन्होंने फागके मिससे मर्यादा छोड़कर [ वनरूप ] शत्रुके नगरपर विजय प्राप्तकर उसे होलीके बहाने जला ( सुखा ) डाला हो और फिर वायुरूपसे पत्ररूप प्रजाको लूटकर समग्र