गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ अयोध्याकाण्ड राग बसन्त [ ४८ ] आजु बन्यो है बिपिन देखो, राम धीर । मानो खेलत फागु मुद मदन बीर बट, बकुल, कदंब, पनस, रसाल । कुसुमित तरु-निकर कुरव-तमाल ॥ मानो बिबिध बेष धरे छैल-यूथ । बिच बीच लता ललना-बरूथ ॥२॥ पनवानक निरझर, अलि उपंग । बोलत पारावत मानो डफ-मृदंग ॥ गायक सुक-कोकिल, झिल्लि ताल । नाचत बहु भाँति बरहि मराल ॥३॥ मलयामिल सीतल, सुरभि, मंद । बहु साहत सुमन-रस रेनु बृंद ॥ मनु छिरकत फिरत सबनि सुरंग । भ्राजत उदार लीला अनंग ॥४॥ क्रीडत जीते सुर-असुर-नाग । हठि सिद्ध-मुनिनके पंथ लाग ॥ कह तुलसिदास, तेहि छाड़ु मंन । जेहि राख राम राजीवनैन ॥५॥ 'हे धैर्यवान् भगवान् राम ! देखिये, आज यह वन ऐसा बना हुआ है, मानो वीरवर कामदेव आनन्दित होकर फाग खेलता हो ॥१॥ वट, बकुल (मौलसिरी), कदम्ब, कटहल, आम, कुरव और तमाल आदि वृक्ष फूले हुए हैं, मानो तरह-तरहके वेष धारण किये अनेकों छैल हों और उनके बीच-बीचमें लतारूप स्त्रीसमुदाय शोभायमान हों ॥ २ ॥ झरने ऐसे जान पड़ते हैं, मानो नगाड़े और ढोल हों, भ्रमर उपङ्ग (मुरचङ्ग) के समान प्रतीत होते हैं तथा कबूतर जो बोलते हैं वह मानो डफ और मृदङ्ग हैं। शुक और कोकिल गान करनेवाले हैं, झिल्लीकी झनकार मानो उनकी ताल है तथा मयूर और हंस अनेकों प्रकारसे नृत्य कर रहे हैं ॥ ३ ॥ शीतल-मन्द- सुगन्ध मलयमारुत फूलोंका रस और पराग लेकर बह रहा है, सो ऐसा जान पड़ता है, मानो उदार लीलाविहारी कामदेव सबपर सुन्दर