गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 234, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २२८ प्रसन्न होकर आपसमें पिचकारियाँ भर रहे हों ॥ १४ ॥ [काले और लाल मुखके] बन्दर अपने बच्चोंको पीठपर चढ़ाकर एक डालसे दूसरी डालपर कूदते हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो [स्वांग रचनेवाले लोग] मुखोंपर गेरू या स्याही लगाकर गधोंपर सवार हो गये हों ॥ १५ ॥ मलयवायु पराग तथा पुष्पोंके रससे भरकर विचर रहा है, मानों वह जहाँ-तहाँ अरगजा छिड़कता हो अथवा मुखोंपर गुलाल या अबीर मल रहा हो ॥ १६ ॥ इस प्रकार प्रभुके लिये कौतुकी कामदेव मानो खेल कर रहा है और इसीलिये रघुनाथ- जीने प्रसन्न होकर उसे विश्वविजयी होनेका वर दिया है ॥ १७ ॥ [और उसे चेता दिया है कि] 'देखो, मेरे दासको दुःख न देना, सर्वदा मेरी इस आज्ञाका पालन करना।' तब कामदेव भी 'प्रभो ! बहुत अच्छा' ऐसा कहकर भगवान्की आज्ञा सिरपर धारणकर वहाँसे चला गया है ॥ १८ ॥ रघुनाथजीका रूप देखकर किराती और किरात भी खूब प्रसन्न हैं और प्रभुका गुण गाते-नाचते जुहार कर- करके चले जाते हैं ॥ १९ ॥ मुनिलोग भगवान्को आशीर्वाद देते और उनकी प्रशंसा करते हैं तथा देवतालोग फूलोंकी वर्षा करते हैं और हृदयमें भगवान्की मङ्गलमयी मूर्ति धारणकर अपने घरोंको चले जाते हैं ॥ २० ॥ जहाँ सीता और लक्ष्मणजीके सहित भगवान् राम सदा ही विहार करते हैं, उस चित्रकूटपर्वतके वनकी शोभाका वर्णन कर कौन कवि पार पा सकता है ॥ २१ ॥ तुलसीदास कहते हैं, हमने तो चाँचर (होली गान) के मिससे ही कुछ रामके गुण गाये हैं। जो स्त्री-पुरुष इनका गान या श्रवण करेंगे वे सब प्रकार शुभ फल प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥