भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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से अत्यन्त भरे हुए हैं। उस वनको देखकर देवताओंके बहुत-से वन और बगीचे भी तुच्छ जान पड़ते हैं ॥ ४-५ ॥ भगवान् रामके वनका वर्णन नहीं हो सकता, वह देखते ही चित्तको चुरा लेता है [और ऐसा जान पड़ता है] मानो मनोहर लता और वृक्षोंसे पूर्ण कामदेव- का निवासस्थान ही हो ॥ ६ ॥ वहाँके नदी और तालाबोंमें रंग- बिरंगे कमल खिले हुए हैं, जिनपर मनोहर भ्रमरगण गुंजारकर रहे हैं तथा तरह-तरहके पक्षी कूज रहे हैं ॥ ७ ॥ लक्ष्मणजी कहते हैं- 'हे रघुनाथजी ! इस वनका ठाट-बाट तो देखिये, ऐसा जान पड़ता है मानो कामदेवके नगरमें उसका प्रिय सुहृद् ऋतुराज (बसन्त) आनन्द मनाने आया हो ॥ ८ ॥ अथवा चित्रकूटपर आपका अधिक प्रेम देखकर मानो अपने सखाके सहित कामदेव फाग खेलने आया हो ॥ ९ ॥ वहाँ जो झींगुरका शब्द होता है वही झांझ है, झरना डफ, नवीन मृदंग और निसानके समान है, भौंरोंका शब्द भेरी और उपंग (नसतरङ्ग) है तथा तोतोंका कलरव ताल है ॥ १० ॥ इस वनमें जो हंस, कपोत, कबूतर, चकवा और चकोर आदि पक्षी बोलते हैं, वे ही इस कामनगरमें मानो चारों ओर नर-नारिवृन्द प्रसन्न होकर गा रहे हैं ॥ ११ ॥ सघन वनखण्डकी ऊँची भूमिमें जो चित्र-विचित्र अनेकों मृग डोल रहे हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो उस नगरकी गलियोंमें अनेकों छैल ही स्वाँग बनाकर विचर रहे हों ॥ १२ ॥ मयूर नृत्य करते हैं तथा कोकिल पक्षी सुन्दर स्वरमें राग बाँधकर गान कर रहे हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो निर्लज्ज युवक और युवतियाँ समयानुसार खेल रहे हों ॥ १३ ॥ हाथी और हथिनियां सूँडोंमें जल भरकर जहाँ-तहाँ उँडेल देती हैं, मानो स्त्री और पुरुष