गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २२६ लिये पराग सुमनरस डोलत मलय-समीर । मनहु अरगजा छिरकत, भरत गुलाल-अबीर ॥ १६ ॥ काम कौतुकी यहि बिधि प्रभुहित कौतुक कीन्ह । रीझि राम रतिनाथहि जग-बिजयी बर दीन्ह ॥ १७ ॥ दुखवहु मोरे दास जनि, मानेहु मोरि रजाइ । 'भलेहि नाथ', माथे धरि आयसु चलेउ बजाइ ॥ १८ ॥ मुदित किरात-किरातिनि रघुबर-रूप निहारि । प्रभुगुन गावत नाचत चले जोहारि जोहारि ॥ १९ ॥ देहिं असीस, प्रसंसहि मुनि, सुर बरषहिं फूल । गवने भवन राखि उर मूरति मंगलमूल ॥ २० ॥ चित्रकूट-कानन-छबि को कबि बरनै पार । जहँ सिय-लषनसहित नित रघुबर करहिं बिहार ॥ २१ ॥ तुलसिदास चाँचरि मिस कहे राम-गुनग्राम । गावहिं, सुनहिं नारि-नर पावहिं सब अभिराम ॥ २२ ॥ जो सीता, राम और लक्ष्मणको अत्यन्त प्रिय तथा तपस्वियोंका निवासस्थान है, उस चित्रकूट-वनको देखकर मनमें बड़ा ही आनन्द होता है ॥ १ ॥ वहाँ बड़ी ही सुहावनी, पवित्रकारिणी एवं पाप- नाशिनी 'पयस्विनी' नामकी नदी है, जो सिद्ध, साधु और देवताओंसे सेवित है और सम्पूर्ण मनोकामनाओंको पूर्ण कर देती है ॥ २ ॥ सघन और सुन्दर जातिके वृक्ष तथा लताएँ नवीन पल्लव और पुष्पोंसे आच्छादित हैं तथा अगणित और अनेक प्रकारके कन्द-मूल एवं जलथलके पौधे लगे हुए हैं ॥ ३ ॥ मनोहर बेत-बकुलसमुदाय (मौलसिरी), कल्पवृक्ष, ताल, तमाल, कदली, कदम्ब, चम्पक, पाटल, कटहल और आम्रके वृक्ष मानों छवि, अनुराग और सौभाग्य-