भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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२२५ अयोध्याकाण्ड बंजुल मंजु, बकुलकुंज, सुरतरु, ताल तमाल। कदलि, कदंब, सुचंपक, पाटल, पनस, रसाल ॥ ४ ॥ सूरुह मूरि भरे जनु छबि-अनुराग-सभाग । बन बिलोकि लघु लागहिं बिपुल बिबुध-बन-बाग ॥ ५ ॥ जाइ न बरनि राम-बन, चितवत चित हरि लेत। ललित-लता-द्रुम-संकुल मनहु मनोज निकेत ॥ ६ ॥ सरित-सरनि सरसीरुह फूले नाना रंग। गुंजत मंजु मधुपबन, कूजत बिबिध बिहंग ॥ ७ ॥ लषन कहेउ रघुनंदन देखिय बिपिन-समाज । मानहु चयन मयन-पुर आयउ प्रिय ऋतुराज ॥ ८ ॥ चित्रकूटपर राउर जानि अधिक अनुरागु । सखासहित जनु रतिपति आयउ खेलन फागु ॥ ९ ॥ झिल्लि झाँझ, झरना डफ नव मृदंग निसान । भेरि उपंग भुंग रव, ताल कीर, बलगान ॥ १० ॥ हंस कपोत कबूतर बोलत चक्र चकोर । गावत मनहु नारिनर मुदित नगर चहुँ ओर ॥ ११ ॥ चित्र-बिचित्र बिबिध मृग डोलत डोंगर डाँग । जनु पुरबीथिन बिहरत छल संवारे स्वांग ॥ १२ ॥ नाचहिं मोर, पिक गावहिं, सुर बर राग बँधान । निलज तरुन-तरुनी जनु खेलहिं समय समान ॥ १३ ॥ भरि भरि सुंड करिनि-करि जहँ तहँ डारहिं बारि । भरत परस्पर पिचवनि मनहु मुदित नर-नारि ॥ १४ ॥ पीठि चढ़ाइ सिसुन्ह कपि कूदत डारहि डार । जनु मुंह लाइ गेरु-मसि भए खरनि असवार ॥ १५ ॥ गी० १५-