भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

गीतावली २२४ दत्तचित्त होकर शीतल और सुन्दर शिलाओंपर जप, तप एवं योगसाधन कर रहे हैं ॥ ५ ॥ सारे किरात और किरातिनियां साधु हो गये हैं। भगवान् रामका दर्शन पाकर उनकी कलुषता जाती रही है। पक्षी और मृगगण अपना स्वाभाविक वैर भूलकर प्रसन्नता- पूर्वक एक साथ विहार कर रहे हैं ॥ ६ ॥ उस वनको कामदेवके क्रीडोद्यान और नन्दनवनकी लघु उपमा देनेमें भी कविको लज्जा होती है, मानो विधाताने सारे भुवनोंकी शोभाको एकत्रकर भगवान् रामके वनमें ही लाकर बसा दिया है ॥ ७ ॥ उस वनके मिससे ही मुनिजन, मुनिपत्नियाँ और मुनिबालक रघुनाथजीके विमल सुयशका वर्णन करते हैं और अपने जीवनका फल पाकर पुलकित एवं शिथिलशरीर, सजलनयन और प्रसन्नचित्त हो जाते हैं ॥ ८ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जहाँ आनन्दके सीमास्वरूप भगवान् राम, लक्ष्मण और सीताजी अयोध्याको त्यागकर निवास करते हैं उस चित्रकूटपर्वतकी सम्पत्ति, महिमा, प्रसन्नता एवं मनोहरताका मैं कैसे वर्णन कर सकता हूँ ॥ ९ ॥ राग गौरी [ ४७ ] देखत चित्रकूट-बन मन अति होत हुलास । सीता-राम-लखन-प्रिय, तापस-बृन्द-निवास ॥ १ ॥ सरित सोहावनि पावनि, पापहरनि पय नाम । सिद्ध-साधु-सुर-सेवित देति सकल मन-काम ॥ २ ॥ बिटप-बेलि नव किसलय, कुसुमित सघन सुजाति । कंदमूल जल-थलरुह अगनित अनबन भाँति ॥ ३ ॥