भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

२२३ अयोध्‍याकाण्ड त्रिबिध समीर, नीर भर झरननि, जहँ तहँ रहे ऋषि कुटी बनाई। सीतल सुभग सीलनिपर तापस करत जोग-जप-तप मन लाई ॥५॥ भए सब साधु किरात-किरातिनि, राम-दरस मिटि गइ कलुषाई। खग-मृग मुदित एक सँग बिहरत सहज बिषम बड़ बैर बिहाई ॥६॥ कामकेलि-बाटिका बिबुध-बन, लघु उपमा कबि कहत लजाई। सकल-भुवन-सोभा सकेलि मनो राम बिपिन बिधि आनि बसाई ॥७॥ बन मिस मुनि, मुनितिय, मुनि-बालक बरनत रघुबर-बिमल-बड़ाई। पुलक सिथिल तनु, सजल सुलोचनु, प्रमुदित मन जीवन फलु पाई ॥८॥ क्यों कहौं चित्रकूट-गिरि, संपति-महिमा-मोद-मनोहर ताई। तुलसी जहँ बसि लषन राम सिय आनंद-अवधि अवध बिसराई ॥६॥ जबसे दोनों भाई आकर रहे हैं तबसे चित्रकूटके वनकी शोभा दिनोंदिन अधिक-अधिक हो रही है ॥ १ ॥ सीता, राम और लक्ष्मणजीके चरणचिह्नोंसे अंकित उस सुहावनी भूमिका वर्णन नहीं होता। मन्दाकिनीका स्नान अथवा दर्शन करनेसे ही तीनों प्रकारके पाप और ताप नष्ट हो जाते हैं ॥ २ ॥ जल और स्थलमें उत्पन्न होनेवाले पौधे, जो सूख चुके थे, फिर हरे हो गये हैं, तथा कमल भी नित्य नवीन-नवीन शोभा धारण कर रहे हैं। सब प्रकारके अभिमत और सुखदायी वृक्ष तथा लता आदि पुष्पित, फलित, पल्लवित और हरे-भरे होरहे हैं ॥३॥नदीओर तालाबोंमेंकमल खिले हुए हैं, मानो लक्ष्मीजी अपनेघरोंको सँभालकर निवासकरनेलगी हों। पक्षिगण कूज रहे हैं तथा भ्रमरोंका मनोहर गुंजार हों रहा है, मानो वे जानेवाले पथिकोंको अपने पास बुला रहे हैं ॥ ४ ॥ शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चल रहा है; झरनोंमें जल झर रहा है, ऋषिगण जहाँ-तहाँ कुटी बनाकर बसे हुए हैं तथा तपस्वी लोग