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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 454 में से

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पृष्ठ 228

गीतावली २२२ इन्होंने करोड़ों चन्द्रमाओंको जीत लिया है ॥ २ ॥ इनके करकमलोंमें सुन्दर-सुन्दर धनुष-बाण तथा कटिप्रदेशमें मनोहर मुनिवस्त्र और सुन्दर तरकस हैं। भगवान् राम अपनी प्राणप्रिया सीता तथा प्रिय सहोदर लक्ष्मणको वृक्ष, लता, मनोहर कुंजों, शिलातक तथा पत्र, पुष्प और फल दिखलाते हैं ॥ ३ ॥ वे ऋषियोंके आश्रमोंकी सराहना करते हैं, मृगोंके नाम बतलाते हैं, सब ओर मधु भरा हुआ है, नदी और झरने झर रहे हैं, मयूर सुहावना नृत्य करते हैं, भौंरे और कोकिल गाना गा रहे हैं तथा अन्य पक्षी और आकाश, जल एवं स्थलमें विहार करनेवाले प्राणी सुन्दर बोली बोल रहे हैं ॥ ४ ॥ प्रभुको देखकर मुनीश्वरगण शरीरमें पुलकित होकर कहते हैं—'देखो ये सब अधम स्त्री-पुरुष आज कैसे बड़भागी हो रहे हैं।' तुलसीदास कहते हैं, जिसके लिये ब्रह्मा, विष्णु और महादेव-जैसे देवता भी सिसकते रहते हैं, उस सुख और लाभको आज किरात और कोल आदि लूट रहे हैं ॥ ५ ॥ राग सारंग [ ४६ ] आइ रहे जबतें दोउ भाई । तबतें चित्रकूट-कानन-छबि दिनदिन अधिक अधिक अधिकाई ॥१॥ सीता-राम-लषन-पद-अंकित अवनि सोहावनि बरनि न जाई । मंदाकिनि मज्जत अवलोकत त्रिबिध पाप, त्रयताप नसाई ॥२॥ उकठेउ हरित भए जल-थलरुह, नित नूतन राजीव सुहाई । फूलत, फलत, पल्लवत, पलुहत बिटप बेलि अभिमत सुखदाई ॥३॥ सरित-सरनि सरसीरुह-संकुल, सवन सँवारि रमा जनु छाई । कूजत बिहँग, मंजु गुंजत अलि, जात पथिक जनु लेत बुलाई ॥४॥

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