गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं। इनके साथकी जो सुघड़ ललना है वह तो देखकर ही लोगोंके चित्तको चुरा लेती है। ये जहाँ-जहाँ जायँगे, वहाँ-वहाँके लोगोंको इसी प्रकार नेत्रोंका लाभ देंगे' ॥ २ ॥ इस प्रकार सभी सुन्दरियाँ प्रेममें विह्वल होकर बटोही राम, लक्ष्मण और सीताकी भारी कथा कह रही हैं। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग उन कथाओंको समाहित चित्तसे सुनकर उन्हींमें मन लगाये रहते हैं, वे भी उन ग्रामनारियोंके समान ही सौभाग्यवान् हैं ॥ ३ ॥ [ ३८ ] बहुत दिन बीते सुधि कछु न लही। गये जो पथिक गोरे-साँवरे सलोने, सखि ! संग नारि सुकुमारि रही ॥ १ ॥ जानि-पहिचान बिनु अपुनें, आपुनेहुतें, प्रानहुतें प्यारे प्रियतम उपही। सुधाके सनेहूके सार लै सँवारे बिधि, जैसे भावते हैं भाँति जाति न कही ॥ २ ॥ बहुरि बिलोकिबे कबहुक, कहंत, तनु पुलक, नयन जलधार बही। तुलसी प्रभु सुमिरि ग्रामजुवती सिथिल, बिनु प्रयास परीं प्रेम सही ॥ ३ ॥ 'अरी सखि ! बहुत दिन बीत गये, परंतु अभीतक जो साँवले- गोरे सुन्दर पथिक गये थे और जिनके साथ एक सुकुमारी स्त्री भी थी, उनकी कुछ भी सुधि नहीं मिली ॥ १ ॥ वे परदेशी—जान पहचान न होनेपर भी—अपनेसे, अपने प्रियजनोंसे तथा अपने