गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१३ अयोध्याकाण्ड प्राणोंसे भी अधिक प्रिय जान पड़ते थे। उन्हें विधाताने अमृत और स्नेहका भी सार लेकर रचा है। वे जैसे प्रिय लगते हैं वह हमसे कहा नही जाता ॥ २ ॥ क्या उन पथिकोंको हम फिर भी देख सकेंगी,—ऐसा कहते ही उनके शरीर पुलकित हो जाते हैं और नेत्रोंसे जलकी धाराएँ बहने लगती हैं।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुका स्मरणकर ग्रामीण स्त्रियाँ शिथिल हो गयी हैं और बिना परिश्रम ही प्रेममें सच्ची सिद्ध हो गयी हैं ॥ ३ ॥ [ ३९ ] आली री ! पथिक जे एहि पथ परौं सिधाएं। ते तौ राम-लखन अवधतें आए ॥ १ ॥ संग सिय सब अंग सहज सोहाए। रति-काम-ऋपति कोटिक लजाए ॥ २ ॥ राजा दसरथ, रानी कौसिला जाए। कैकेयी कुचाल करि कानन पठाए ॥ ३ ॥ बचन कुभामिनीके भूपहि क्यों भाए ? हाय ! हाय ! राय बाम बिधि भरमाए । ४ ॥ कुलगुर सचिव काहू न समुझाए। कांच-मनि लै अमोल मानिक गवाँए ॥ ५ ॥ भाग मग-लोगनिके, देखन् जे पाए। तुलसी सहित जिन गुन-गन गाए ॥ ६ ॥ अरी आली ! परसों जो पथिक इस मार्गसे गये थे, उनका नाम राम-लक्ष्मण था और वे अयोध्यापुरीसे आये थे ॥ १ ॥ उनके साथ सीताजी थीं। वे स्वभावसे ही सब अङ्गोंसे शोभायमान थे। उन्हें देखकर करोड़ों रति, कामदेव और ऋतुराज (बसन्त)