गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२११ अयोध्याकाण्ड तुलसीदासजी कहते हैं, जिनका शरच्चन्द्रके समान सुन्दर मुखमण्डल है, सिरपर जटाएँ हैं तथा अरुण कमलके समान अति सुन्दर नेत्र हैं, वे करोड़ों कामदेवोंके मदका मथन करनेवाले प्रभु हमारे मनोमय मार्गमें विराजमान हैं ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ३७ ] आली ! काहू तौ बूझौ न पथिक कहाँ धौं सिधैहैं । कहाँतें आए हैं, को हैं, कहा नाम स्याम-गोरे, काज कें कुसल फिरि एहि मग ऐहैं ? ॥ १ ॥ उठति बयस, मसि भींजति, सलोने सुठि, सोभा-देखवैया बिनु बित्त ही बिकैहैं । हिये हेरि हेरि लेत लोनी ललना समेत, लोयननि लाहु देत जहाँ जहाँ जैहैं ॥ २ ॥ राम-लषन-सिय-पंथिकी कथा पृथुल, प्रेम बिथकीं कहति सुमुखि सबै हैं । तुलसी तिन्ह सरिस तेऊ भूरिभाग जेऊ, सुनि कै सुचित तेहि समैं समैहैं ॥ ३ ॥ 'अरी आली ! किसीसे पूछो तो 'ये पथिक कहाँ जायेंगे ? कहाँसे आये हैं ? कौन हैं ? इन श्याम-गौर कुमारोंके नाम क्या हैं ? और अपना कार्य समाप्त करनेपर फिर कुशलपूर्वक इसी मार्गसे लौटेंगे या नहीं ? ॥ १ ॥ इनकी उठती हुई अवस्था है, शरीरपर यौवनका रंग चढ़ रहा है, देखनेमें बड़े ही सुहावने और सरल जान पड़ते हैं, इनकी शोभा देखनेवाले बिना मोल ही बिके जा रहे