भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 215

२०६ अयोध्याकाण्ड किया है और कैसे आगे करेंगे; यह तो एक नयी लीला देखनेमें आ रही है। मार्गके सारे नर-नारी इसी सोच और संकटमें पड़े हुए हैं, उन सभीकी बुद्धि भगवान् रामके अनुराग-रूप रंगमें रँग गयी है ॥ ३ ॥ कोई कहते हैं—'यह वाम विधाता हमारे लिये तो अनुकूल ही है, इसने उधरहै पीठ कर ली (विमुख) है तो हमारी ओर तो इसकी सुदृष्टि ही जान पड़ती (अनुकूल) है।' अतः तुलसीदासजी कहते हैं, बनवासी मुनियोंके सहित हमारी बात तो अनायास ही खूब अच्छी तरह बन गयी है ॥ ४ ॥ राग गौरी [ ३५ ] नीके कै मैं न बिलोकन पाए। सखि ! यहि मग जुग पथिक मनोहर, बधु बिधु-बदनि समेत सिधाए ॥ १ ॥ नयन सरोज, किसोर बयस बर, सीस जटा रचि मुकुट बनाए। कटि मुनिबसन-तून, धनु-सर कर, स्यामल-गौर, सुभाय सोहाए ॥ २ ॥ सुंदर बदन, बिसाल बाहु-उर, तनु-छबि कोटि मनोज लजाए। चितवत मोहि लगी चौंधी-सी, जानौं न, कौन, कहाँ तें धौं आए ॥ ३ ॥ मनु गयो संग, सोचबस लोचन मोचत बारि, कितौ समुझाए। तुलसिदास लालसा दरसकी सोइ पुरवै, जेहि आनि देखाए ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! इस मार्गसे जो दो मनोहर पथिक एक चन्द्रमुखी स्त्रीके सहित गये हैं, उन्हें मैं तो अच्छी तरह देख भी न सकी ॥ १ ॥ उनके नेत्र कमलके समान थे, सुन्दर किशोर अवस्था थी, सिरपर जटाओंसे रचकर मुकुट बनाये हुए थे, कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र और गी० १४—