भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

गीतावली २०८ भाईके प्रान समान, प्रियाके प्रानके प्रान, जानि बानि प्रीति रीति कृपासील मई है ॥ १ ॥ आलबाल-अवध सुकामतरु कामबेलि, दूरि करि अकई विपत्ति-बेलि बई है । आप, पति, पूत, गुरुजन, प्रिय परिजन, प्रजाहूको कुटिक दुसह दशा दई है ॥ २ ॥ पंकजसे पगनि पानह्रौं न, परुष पंथ, कैसे निबहे हैं, निबहेंगे, गति नई है ? । एही सोच-संकट-मगन मग-नर-नारि, सबकी सुमति राम-राग-रँग रई है ॥ ३ ॥ एक कहै, बाम बिधि दाहिनो हमको भयो, उत कीन्हीं पीठि, इतको सुडीठि भई है । तुलसी सहित बनबासी मुनि हमरिऔ, अनायास अधिक अघाइ बनि गई है ॥ ४ ॥ जो भाई लक्ष्मणके प्राणोंके समान और प्रियतमा सीताके प्राणोंके भी प्राण हैं उनकृपाशीलमय रघुनाथजीनेस्वभाव तथा प्रीतिकी रीति जानकर ही बड़े संकोचसे सिरससुमनके समान सुकुमारी तथा सौन्दर्यकी सीमा श्रीसीताजीको अपने साथ लिया है ॥ १ ॥ कैकेयीने अयोध्यारूप आलबालसे [राम और सीतारूप] कल्पवृक्ष एवं कल्पलताको निकालकर उसमें विपत्तिकी बेल बो दी है । इस प्रकार उसने अपने लिये तथा पति, पुत्र, गुरुजन, प्रिय-कुटुम्बियों एवं प्रजा- वर्गके लिये भी अत्यन्त कुटिल और दुःसह दशा उपस्थित कर दी है ॥ २ ॥ मार्ग बड़ा कठिन है और पैरोंमें जूते भी नहीं हैं; अतः अपने कमल-जैसे कोमल चरणोंसे उन्होंने कैसे तो अबतक निर्वाह