गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१८५ अयोध्याकाण्ड प्राननाथ परदेस पयादेहि चले सुख सकल तजे तृन तूरि । करौं बयारि, बिलंबिय बिटपतर, झारौं हौं चरन-सरोरुह-धूरि ॥२॥ तुलसिदास प्रभु प्रियाबचन सुनि नीरजनयन नीर आए पूरि । कानन कहां अबहिं सुनु सुंदरि, रघुपति फिरि चितए हित भूरि ॥३॥ (मार्गमें थक जानेसे) श्रीजानकीजी चिन्तित होकर भगवान् रामसे पूछती हैं—'हे कोसलराजकुमार ! आपने जहांके लिये प्रस्थान किया है वह वन यहाँसे कितनी दूर है; ॥ १ ॥ हे प्राणनाथ ! आपने सब सुखोंको तृण तोड़कर त्याग दिया (सुखोंसे एकदम सम्बन्ध त्याग कर दिया) और अब परदेशको पैदल ही जा रहे हैं। (आप थक गये होंगे) कुछ देर इस वृक्षके नीचे विश्राम कीजिये; मैं आपको हवा करूँगी और चरणकमलोंकी धूलि झाड़ूँगी' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, प्रियाके ये वचन सुनकर प्रभुके नेत्रकमलोंमें जल भर आया; और 'अरि सुन्दरि ! अभी वन कहाँ ;' ऐसा कहकर उनकी ओर अत्यन्त प्रीतिपूर्वक निहारा ॥ ३ ॥ [ १४ ] फिरि फिरि राम सीय तनु हेरत । तृषित जानि जल लेन लषन गए, भुज उठाइ ऊँचे चढ़ि टेरत ॥१॥ अवनि कुरंग, बिहंग द्रुम-डारन रूप निहारत पलक न प्रेरत । मगन न डरत निरखि कर-कमलनि सुभग सरासन सायक फेरत ॥२॥ अवलोकत मग-लोग चहुँ दिसि, मनहु चकोर चंद्रमहि घेरतः । ते जन भूरिभाग भूतलपर तुलसी राम-पथिक-पद जे रत ॥३॥ भगवान् राम मुड़-मुड़कर सीताजीकी ओर देखते हैं। उन्हें प्यासी जानकर लक्ष्मणजी जल लेने गये, तब भगवान् ऊँचे टीलेपर
गीतावली १८६ चढ़कर उन्हें भुजा उठाकर पुकारते हैं ॥ १ ॥ पृथ्वीपर मृग और वृक्षोंकी डालियोंपर पक्षी प्रभुका रूप-लावण्य देख रहे हैं—वे पलक भी नहीं मारते और प्रभुको अपने धनुष-बाणपर कर-कमल फेरते देखकर भी भय नहीं मानते—प्रेममें मग्न हो रहे हैं॥ २ ॥ मार्गमें लोग चारों दिशाओंसे देख रहे हैं, मानो चकोर पक्षी चन्द्रमाको घेरे हुए हों। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग बटोही रामके चरणोंमें रत हैं, वे पृथ्वीपर बड़े ही भाग्यशाली हैं ॥ ३ ॥ [ १५ ] नृपति-कुंवर राजत मग जात । सुंदर बदन, सरोरुह-लोचन, मरकत-कनकबर न मृदु गात ॥१॥ अंसनि चाप, तून कटि मुनि पट, जटामुकुट बिच नूतन पात । फेरत पानि सरोजनि सायक, चोरत चितहि सहज मुसुकात ॥२॥ संग नारि सुकुमारि सुभग सुठि, राजति बिन भूषन नव सात । सुखमा निरखि ग्राम-बनितनिके नलिन-नयन बिकसित मनो प्रात ॥३॥ अंग-अंग अगनित अनंग-छबि, उपमा कहत सुकबि सकुचात । सिय समेत नित तुलसिदास चित, बसत किसोर पथिक दोउ भ्रात ॥४॥ मार्गमें जाते हुए राजकुमार बड़े ही शोभायमान हो रहे हैं। उनका सुन्दर मुखमण्डल है, कमलके समान नेत्र हैं तथा मरकतमणि और सुवर्णके-से रंगके मृदुल शरीर हैं ॥ १ ॥ वे कन्धोंपर धनुष रखे हुए हैं, कमरमें तरकस और मुनिजनोचित वस्त्र हैं, सिरपर जटा-जूटका मुकुट है, जिसमें बीच-बीचमें नवीन पत्ते खोंसे हुए हैं। वे धनुषपर अपना करकमल फेर रहे हैं और स्वभावसे मुसकराते ही चित्तको चुरा लेते हैं ॥ २ ॥ उनके साथमें सोलहों शृङ्गार किये
१८७ अयोध्याकाण्ड बिना ही एक अति सुन्दरी सुकुमारी स्त्री शोभायमान है। उनकी शोभा देखते ही ग्रामीण स्त्रियोंके नेत्रकमल प्रातःकालीन कमलोंके समान खिल उठते हैं॥ ३॥ उनके अङ्ग-अङ्गमें अगणित कामदेवोंकी शोभा है, उसकी उपमा कहनेमें अच्छे-अच्छे कवि भी संकोच मानते हैं। तुलसीदासके हृदयमें तो सीताजीके सहित वे किशोर अवस्थावाले बटोही दोनों भाई सर्वदा विराजमान रहते हैं॥ ४॥ [ १६ ] तू देखि देखि री ! पथिक परम सुंदर दोऊ। मरकत-कलधौत-बरन, काम-कोटि-कांतिहरन, चरन-कमल कोमल अति, राजकुँवर कोऊ ॥ १ ॥ करसर-धनु, कटि निषंग, मुनिपट सोहैं सुभग अंग, संग चंद्रबदनि बधू, सुंदरि सुठि सोऊ। तापस बर बेष किए, सोभा सब लूटि लिए, चितके चोर, बय किसोर, लोचन भरि जोऊ ॥ २ ॥ दिनकर-कुलमनि निहारि प्रेम-मगन ग्राम-नारि, परस्पर कहैं, सखि ! अनुराग ताग पोऊ। तुलसी यह ध्यान-सुधन जानि मानि लाभ सघन, कृपिन ज्यों सनेह सो हिये-सुगेह गोऊ ॥ ३ ॥ [कोई ग्रामीण स्त्री कहती है—] 'अरी सखि ! तू देख तो ये दोनों पथिक बड़े ही सुन्दर हैं। ये मरकत और सुवर्णके समान स्याम एवं गौरवर्ण हैं, करोड़ों कामदेवोंकी कान्तिको हरनेवाले हैं तथा इनके चरण-कमल अत्यन्त कोमल हैं। जान पड़ता है—ये कोई राजकुमार हैं ॥ १ ॥ इनके हाथोंमें धनुष-बाण हैं, कमरमें
गीतावली १८८ तरकस है तथा सुन्दर शरीरमें मुनिजनोचित वस्त्र शोभायमान है। इनके साथ एक चन्द्रमुखी स्त्री है, वह भी बड़ी ही सुन्दरी है। इन्होंने तपस्वियोंका-सा सुन्दर वेष धारणकर मानो सारी शोभा लूट ली है। इस किशोर अवस्थावाले चित्तचोरोंको तनिक नेत्र भरकर देख ले' ॥ २ ॥ तब सूर्यकुलशिरोमणि भगवान् रामको देख- कर सब ग्राम-नारियाँ प्रेममें मग्न हो गयीं और आपसमें कहने लगीं— 'अरि सखि ! इन मणियोंको प्रेमरूप तागेमें पिरो लो'। तुलसीदास कहते हैं, इस ध्यानको शुभ धन जानकर और इसे ही बड़ा भारी लाभ समझकर तू कृपणके समान प्रेमपूर्वक अपने हृदयरूप घरमें छिपाकर रख ॥ ३ ॥ [ १७ ] कुँवर साँवरो, री सजनी ! सुंदर सब अंग। रोम रोम छबि निहारि आलि वारि फेरि डारि, कोटि भानु-सुवन सरद-सोम, कोटि अनंग ॥ १ ॥ बाम अंग लसत चाप, मौलि मंजु जटा-कलाप, सुचि सर कर, मुनिपट कटि-तट कसे निषंग। आयत उर-बाहु नैन, मुख-सुखमाको लहै न, उपमा अवलोकि लोक, गिरामति-गति भंग ॥ २ ॥ यों कहि भईं मगन बाल, बिथकीं सुनि जुवति-जाल, चितवत चले जात संग, मधुप-मृग-बिहंग। बरनौं किमि तिनकी दसहि, निगम-अगम प्रेम-रसहि, तुलसी मन-बसन रँगे रुचिर रूपरंग ॥ ३ ॥ 'अरि सखि ! यह साँवला कुमार तो सभी अङ्गोंसे सुन्दर है। अरी आली ! इनकी रोम-रोम की छवि देखकर इनपर करोड़ों
१८६ अयोध्याकाण्ड अश्विनीकुमार, शरद्ऋतुके चन्द्रमा और कामदेव निछावर कर दे॥१॥ इनके वामभागमें धनुष शोभायमान है, सिरपर मनोहर जटाजूट है, हाथमें सुन्दर बाण है तथा कटिप्रदेशमें मुनियोंके-से वस्त्र और तरकस कसे हुए हैं। इनके वक्षःस्थल, भुजाएँ और नेत्र विशाल हैं तथा मुखकी शोभा तो कोई भी नहीं पा सकता। संसारमें इनकी उपमा देखते-देखते तो सरस्वतीकी बुद्धिकी भी गति नष्ट हो गयी है'॥२॥ ऐसा कहकर ग्रामकी बालाएँ भगवान्की रूपराशिमें डूब गयीं तथा उनकी बातें सुनकर नवयुवतियाँ थकी-सी रह गयीं। भौंरे, मृग और पक्षिगण तो प्रभुको निहारते हुए उन्हींके संग हो लिये। तुलसीदास कहते हैं, उनके शरीरकी दशा तथा वेदके लिये भी अगम्य प्रेमरसका मैं कैसे वर्णन करूँ ? उनके मनरूप वस्त्र प्रभुके अति रुचिर रूप-रंगमें रँग गये ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ १८ ] देखु, कोऊ परम सुंदर सखि ! बटोही । चलत महि मृदु चरन अरुन-बारिज-बरन, भूपसुत रूपनिधि निरखि हौं मोही ॥ १ ॥ अमल मरकत स्याम, सील-सुखमा-धाम, गौरतनु सुभग सोभा सुमुखि जोही । जुगल बिच नारि सुकुमारि सुठि सुंदरी, इंदिरा इंदु-हरि मध्य जनु सोही ॥ २ ॥ करनि बर धनु तीर, रुचिर कटि तूनीर, बीर, सुर-सुखद, मरदन अवनि-द्रोही ।
गीतावली १६० अंबुजायत नयन, बदन-छबि बहु मयन, चारु चितवनि चतुर लेति चित पोही ॥ ३ ॥ बचन प्रिय सुनि श्रवन राम करुनाभवन, चितए सब अधिक हित सहित कछु ओही । दास तुलसी नेह-बिबस बिसरी देह, जानि नहि आपु तेहि काल धौं को ही ॥ ४ ॥ 'अरि सखि ! देख तो कोई बड़े ही सुन्दर बटोही राजकुमार अपने अरुणकमलवत् कोमल चरणोंसे पृथ्वीपर पैदल जा रहे हैं ; उन रूपनिधानको देखकर मैं तो मोहित हो गयी हूँ ॥ १ ॥ अरी सुमुखि ! मैंने उनके शील और सुषमाके आगार, स्वच्छ मरकतमणि- के समान श्याम तथा अति सुन्दर गोरे शरीरोंकी शोभा देखी है । उन दोनोंके बीचमें एक परम लावण्यमयी और सुन्दरी सुकुमारी नारी है, मानो चन्द्रमा और श्रीहरिके मध्यमें साक्षात् लक्ष्मीजी ही विराजमान हों ॥ २ ॥ उनके करकमलोंमें मनोहर धनुष-बाण हैं और कमरमें सुन्दर तरकस है । वे बड़े ही धीर, देवताओंको सुख देनेवाले और पृथ्वीके द्रोहियोंका दमन करनेवाले हैं । उनके नयन कमलदलके समान विशाल और मुखकी कान्ति अनेकों कामदेवोंके सदृश है तथा वे परम चतुर अपनी चारु चितवनसे सबके चित्तोंको आकर्षित कर लेते हैं' ॥ ३ ॥ उनके ये प्रिय वचन कानोंमें पड़ते ही करुणा-अयन भगवान् रामने उनकी ओर कुछ और भी अधिक प्रीतिसे देखा । तुलसीदासजी कहते हैं, तब प्रेमसे अधीर हो जानेके कारण उन्हें अपनी शरीरकी सुधि जाती रही और उस समय किसीको अपना भी ज्ञान न रहा ॥ ४ ॥
१६१ अयोध्याकाण्ड राग केदारा [ १९ ] सखि ! नीके कै निरखि, कोऊ सुठि सुंदर बटोही । मधुर मूरति मदनमोहन जोहन-जोग, बदन सोभासदन, देखि हौं मोही ॥ १ ॥ साँवरे-गोरे किसोर, सुर-मुनि-चित्त-चोर, उभय-अंतर एक नारि सोही। मनहु बारिद-बिधु बीच ललित अति, राजति तड़ित निज सहज बिछोही ॥ २ ॥ उर धीरजहि धरि, जनम सफल करि, सुनहि सुमुखि ! जनि बिकल होही। को जाने, कौने सुकृत लह्यो है लोचन-लाहु, ताहितैं बारहि बार कहति तोही ॥ ३ ॥ सखिहि सुसिख दई, प्रेम-मगन भई, सुरति बिसरि गई आपनी ओही। तुलसी रही है ठाढ़ी पाहन गढ़ी-सी काढ़ी, कौन जाने, कहाँतें आई, कौनकी कोही ॥ ४ ॥ 'अरि सखि ! तनिक अच्छी तरह देख, कोई बड़े ही सुन्दर बटोही जा रहे हैं । देख, कामदेवको भी लुभानेवाली इनकी मधुर मूर्ति देखने ही योग्य है । इनके शोभामय मुखमण्डलको देखकर मैं तो मोहित हो गयी हूँ ॥ १ ॥ ये साँवरे-गोरे किशोरवयस्क बालक देवता और मुनियोंके भी चित्तको चुरानेवाले हैं। इन दोनोंके बीचमें एक सुन्दरी बाला सुशोभित है, मानो मेघ और चन्द्रमाके मध्यमें अति ललित विद्युत् अपना स्वभाव (चंचलता) छोड़कर विराज रही
गीतावली १६२ हो ॥ २ ॥ अरी सखि ! मैं जो कुछ कहती हूँ वह सुन, व्याकुल मत हो और चित्तमें धैर्य धारण कर अपना जन्म सफल कर ले। कौन जाने, आज किस पुण्यके प्रतापसे हमें यह नेत्रोंका लाभ मिला है; इसीसे मैं तुझसे बारंबार कह रही हूँ ॥ ३ ॥ इस प्रकार सखीको सुशिक्षा दे वह प्रेममें डूब गयी और उसे अपनी सुधि जाती रही। तुलसीदास कहते हैं, फिर तो वह पत्थरमें गढ़कर काढ़ी हुई (मूर्ति) के समान ज्यों-की-त्यों खड़ी रह गयी। फिर यह कौन जाने कि वह कहाँसे आयी थी और किसकी कौन लगती थी ? ॥ ४ ॥ [ २० ] माई ! मनके मोहन जोहन-जोग जोही। थोरी ही बयस गोरे-सांवरे सलोने लोने, लोयन ललित, बिधुबदन बटोही ॥ १ ॥ सिरनि जटा-मुकुट मंजुल सुमनजुत, तैसिये लसति नव पल्लव खोही। किये मुनि-बेष बीर, घरे धनु-तून-तीर, सोहैं मग, को हैं, लखि परै न मोही ॥ २ ॥ सोभाको सांचो सँवारि रूप जातरूप, ढारि नारि बिरची बिरंचि, संग सोही। राजत रुचिर तनु सुंदर धमके कन, चाहे चकचौंधी लागे, कहौं का तोही ? ॥ ३ ॥ सनेह-सिथिल सुनि बचन सकल सिया, चितई अधिक हित सहित ओही। तुलसी मनहु प्रभु-कृपाकी मूरति फिरि हेरि कै हरषि हिये लियो है पोही ॥ ४ ॥
१६३ अयोध्याकाण्ड अरी माई ! वे मनमोहन वे देखने ही योग्य हैं; आज मैंने उन्हें देखा है। उनकी थोड़ी ही अवस्था है और वे परम सुन्दर साँवले- गोरे, सुन्दर नेत्रवाले, चन्द्रमुख बटोही नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले हैं ॥ १ ॥ उनके सिरपर सुन्दर पुष्पोंके सहित जटाओंका मुकुट है और वैसे ही नवीन पत्तोंकी खोही (पत्तोंका बना हुआ छाता) भी है। वे वीरश्रेष्ठ मुनियोंका वेष बनाये, धनुष-बाण और तरकस धारण किये मार्गमें शोभायमान हैं। वे हैं कौन—यह मैं नहीं जानती ॥ २ ॥ विधाताने शोभाका साँचा और रूपका सुवर्ण बनाकर जो एक स्त्री ढाली है वही उनके साथ शोभायमान है। उनके सुन्दर शरीरपर पसीनेकी सुहावनी बूंदें विराजती हैं। तुझसे क्या कहूँ, उन्हें देखकर आँखोंमें चकाचौंध हो जाती है ॥ ३ ॥ उसके ये सारे वचन सुन सीताजी स्नेहसे शिथिल हो गयीं और उसकी ओर विशेष प्रेमसे देखा। तुलसीदास कहते हैं, मानो प्रभुकृपाकी मूर्तिने उसकी ओर घूमकर प्रसन्नतापूर्वक देखकर उसका हृदय अपनेमें ही अटका लिया है (जिससे अब वह अन्यत्र नहीं जा सकता) ॥ ४ ॥ [ २१ ] सखि ! सरद-बिमल-बिधुबदनि बधूटी । ऐसी ललना सलोनी न भई, न है, न होनी, रत्यो रची बिधि जो छोवत छबि छूटी ॥ १ ॥ साँवरे गोरे पथिक बीच सोहति अधिक, तिहुँ त्रिभुवन-सोभा मनहु लूटी । तुलसी निरखि सिय प्रेमबस कहैं तिय, लोचन-सिसुन्ह देहु अमिय घूटी ॥ २ ॥ गी० १३—
गीतावली १६४ 'अरी सखि ! यह बहू तो शरत्कालीन निर्मल चन्द्र के समान सुन्दर मुखवाली है। ऐसी सुन्दर स्त्री तो न पहले हुई, न है और न आगे ही होगी। विधाताने रतिको भी, इसे सुधारते समय जो छबि रह गयी थी, उसीसे रचा है ॥ १ ॥ यह इन साँवले-गोरे पथिकोंके बीचमें और भी अधिक शोभायमान होती है, मानों इन तीनोंने मिलकर तीनों लोकोंकी शोभा लूट ली हो।' तुलसीदासजी कहते हैं, सीताको देखकर स्त्रियाँ प्रेमके वशीभूत होकर कहती हैं— 'अरी ! अपने नेत्ररूप बालकों यह अमृतमयी घुट्टी पिलाओ' ॥ २ ॥ [ २२ ] सोहैं साँवरे पथिक, पाछे ललना लोनी। दामिनि-बरन गोरी, लखि सखि तृन तोरी, बीती हैं बय किसोरी, जोबन होनी ॥ १ ॥ नीके कै निकाई देखि, जनम सफल लेखि, हम-सी भूरि-भागिनि नभ न छोनी। तुलसी-स्वामी-स्वामिनि जोहे मोही हैं भामिनि, सोभा-सुधा पिए करि अँखिया दोनी ॥ २ ॥ साँवले पथिकके पीछे यह अति सुन्दरी ललना शोभायमान है। यह बिजलीके समान गौरवर्ण है। देखकर सखियाँ तृण तोड़ती और कहती हैं—'इसकी किशोरावस्था तो बीत चुकी है, अब यौवन आनेवाला है। ॥१॥ इसकी सुन्दरताको अच्छी तरह देखकर अपना जन्म सफल समझो। हमारे समान बड़भागिनी स्त्रियाँ तो स्वर्गमें अथवा पृथ्वीपर कहीं भी नहीं हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, स्वामी और स्वामिनीजीको देखकर ग्रामोंकी स्त्रियाँ उनके सौन्दर्य- सुधा-को नेत्ररूप दोनोंसे पीकर मोहित हो रही हैं ॥ २ ॥
१६५ अयोध्याकाण्ड [ २३ ] पथिक गोरे-सांवरे सुठि लोने। संग सुतिय, जाके तनुतें लही है द्युति सोन सरोरुह सोने॥ १ ॥ बय किसोर-सरि-पार मनोहर बयस-सिरोमनि होने। सोभा-सुधा आलि ! अँचवहु करि नयन मंजु मृदु दोने॥ २ ॥ हेरत हृदय हरत, नहि फेरत चाह बिलोचन कोने। तुलसी प्रभु किधौं प्रभुको प्रेम पढ़े प्रगट कपट बिनु टोने॥ ३ ॥ 'ये सांवले-गोरे पथिक बड़े ही सुन्दर और सुहावने हैं इनके साथ एक सुन्दर स्त्री है जिसके शरीरसे अरुणकमल और सुवर्णने भी कान्ति पायी है॥ १ ॥ किशोरावस्थारूप सरिताको पाकर अब 'ये आयुशिरोमणि युवावस्थामें प्रवेश करनेवाले हैं। अरी आली ! अपने नेत्रोंको मनोहर और मृदुल दोनों बनाकर इनकी छबिरूप अमृतका पान करो॥ २ ॥ ये देखते ही हृदय हर लेते हैं और मनोहर नेत्र कोने नहीं फेरते।' तुलसीदास कहते हैं कि प्रभु अथवा प्रभुका प्रेम तो किसी प्रकारका दुराव न रखकर स्पष्ट ही टोना पढ़ता है॥३॥ [ २४ ] मनोहरताके मानो ऐन। स्यामल-गोर किसोर पथि दोउ, सुमुखि ! निरखु भरि नैन॥ १ ॥ बीच बधू बिधुबदनि बिराजति, उपमा कहुँ कोऊ है न। मानहु रति ऋतुनाथ सहित मुनिबेष बनाए है मैन॥ २ ॥ किधौं सिंगार-सुखमा-सुप्रेम मिलि चले जग-चित-बित लैन। अदभुत त्रयी किधौं पठई है बिधि मग-लोगन्हि सुख दैन॥ ३ ॥ सुनि सुचि सरल सनेहु सुहावने ग्रामबधुन्हके बैन। तुलसी प्रभु तरु तर बिलंबे, किये प्रेम कनौड़े कें न ? ॥ ४ ॥
'अरी सखि ! तनिक नेत्र भरकर देख, ये दोनों श्याम-गौर किशोर-वयस्क पथिक तो मानो मनोहरताके आश्रय ही हैं ॥ १ ॥ इनके बीचमें एक चन्द्रमुखी स्त्री विराज रही है, जिसकी कहीं कोई भी उपमा नहीं है, मानो रति और ऋतुराज बसन्तके सहित साक्षात् कामदेव ही मुनिवेश धारण किये हों ॥ २ ॥ अथवा शृङ्गार, सुन्दरता और सुप्रेम ही आपसमें मिलकर संसारका चित्तरूप धन हरण करने- के लिये तो नहीं चले, किंवा विधाताने अद्भुतत्रयी (वशीकरण, आकर्षण और मोहनी) को ही मार्गस्थ लोगोंको सुख देनेके लिये भेजा है' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, ग्रामवधुओंके ये पवित्र, सरल, स्नेहमय, सुहावने वचन सुनकर प्रभु एक वृक्षके नीचे ठहर गये, क्योंकि प्रेम करनेपर वे किसके कनौड़े नहीं हो जाते ॥ ४ ॥ [ २५ ] बय किसोर गोरे साँवरे धनुबान धरे हैं। सब अँग सहज सोहावने, राजिव जिते नैननि-बदननि बिधु निदरे हैं॥ १ ॥ तून - सुमुनिपट कटि कसे, जटामुकुट करे हैं। मंजु मधुर मृदुमूरति, पानह्रों न पायनि, कैसे धौं पथ बिचरे हैं॥ २ ॥ उभय बीच बनिता बनी, लखि मोहि परे हैं। मदन सप्रिया सप्रिय सखा मुनि-बेष बनाए लिए मन जात हरे हैं॥ ३ ॥ सुनि जहँ तहँ देखन चले अनुराग भरे हैं। राम-पथिक छवि निरखि कैं, तुलसी, मग-लोगनि धाम- काम बिसरे हैं॥ ४ ॥
१६७ अयोध्याकाण्ड 'कुमारोंकी किशोरावस्था है, श्याम ओर गौरवर्ण हैं और धनुष- बाण धारण किये हैं। उनके सभी अङ्ग सहज शोभायुक्त हैं, नेत्रोंने कमलोंको जीत लिया है और मुख चन्द्रमाका निरादर करता है ॥ १ ॥ वे कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र तथा तरकस कसे हुए हैं और सिरपर जटाओंका मुकुट बनाये हैं। उनकी अति मञ्जुल और मधुर मृदुल मूर्ति है, पैरोंमें जूतियाँ भी नहीं हैं, न जाने ये किस प्रकार मार्गमें चलकर आये हैं ॥ २ ॥ दोनोंके बीचमें एक स्त्रीरत्न है, उन्हें देखकर हम तो मोहित हो गयी हैं, मानो साक्षात् कामदेव ही अपनी प्रिया रति और प्रिय सखा बसन्तके साथ मुनिवेष बनाकर हमारे चित्तको हरे लिये जाता है' ॥ ३ ॥ यह सुनकर सब लोग जहाँ-तहाँ प्रेमसे भरकर उन्हें देखनेके लिये चल दिये । तुलसीदास कहते हैं, बटोही रामकी छबि देखकर मार्गके लोग अपने घरके धंधोंको भी भूल गये हैं ॥ ४ ॥ [ २६ ] कैसे पितु-मातु, कैसे ते प्रिय-परिजन हैं ? जगजलधि ललाम, लोने लोने, गोरे-स्याम, जिन पठाए हैं ऐसे बालकनि बन हैं ॥ १ ॥ रूपके न पारावार, भूपके कुमार मुनिबेष, देखत लोनाई लघु लागत मदन हैं। सुखमाकी मूरति-सी साथ निसिनाथ-मुखी, नखसिख अंग सब सोभाके सदन हैं ॥ २ ॥ पंकज-करनि चाप, तीर-तरकस कटि, सरद-सरोजहुतें सुंदर चरन हैं।
सीता-राम-लखन निहारि ग्रामनारि कहें, हेरि, हेरि, हेरि ! हेली हियके हरन हैं ॥ ३ ॥ प्रानहूके प्रानसे, सुजीवनके जीवनसे, प्रेमहूके प्रेम, रंक कृपिनके धन हैं। तुलसीके लोचन-चकोरके चंद्रमासे, आछे मन-मोर चित-चातकके घन हैं ॥ ४ ॥ "अरी सखि ! वे माता-पिता कैसे हैं ? और कैसे वे प्रिय कुटुम्बी लोग हैं जिन्होंने संसारसमुद्रके सुन्दर रत्नरूप इन सलोने श्याम-गौर बालकोंको वनमें भेज दिया है ? ॥ १ ॥ इनके रूपका पारावार नहीं है; इन मुनिवेषधारी राजकुमारोंकी सुन्दरता देखकर तो कामदेव भी तुच्छ जान पड़ता है। इनके साथ सौन्दर्यकी मूर्ति-जैसी एक चन्द्रमुखी बाला है जिसके नखसे लेकर शिखापर्यन्त सभी अङ्ग शोभाके आश्रय हैं ॥२॥ इनके करकमलोंमें धनुष है और कमरमें तीरोंसे भरा तरकस है तथा इनके चरण शरत्कालीन कमलसे भी सुन्दर हैं।' इस प्रकार सीता, राम और लक्ष्मणको देखकर गाँवोंकी स्त्रियाँ कहती हैं—'अरी सहेली ! देख, देख, देख, तो बड़े ही चित्तको चुरानेवाले हैं ॥ ३ ॥ ये तो प्राणोंके भी प्राण-जैसे, जीवनके भी जीवन-जैसे, प्रेमके भी प्रेम- जैसे और रंक तथा कृपणोंके भी धन-जैसे हैं। ये तुलसीदासके नेत्र- रूप चकोरके लिये चन्द्रमाके समान तथा मनरूप मोर और चित्तरूप चातकके लिये सुन्दर मेघके समान हैं ॥ ४ ॥ राग भैरव [ २७ ] देखि ! द्वै पथिक गोरे-सांवरे सुभग हैं। सुतिय सलोनी संग सोहत सुंमग हैं ॥ १ ॥
१६६ अयोध्याकाण्ड सोभासिंधु-संभव-से नीके नीके नग हैं। मातु-पितु-भाग बस गए परि फँग हैं॥ २॥ पाइँ पनह्यो न, मृदु पंकज-से पग हैं। रूपकी मोहनी मेल्लि मोहे अग-जग हैं॥ ३॥ मुनि-बेष घरे, धनु-सायक सुलग हैं। तुलसी हिये लसत लोने लोने डग हैं॥ ४॥ 'अरी सखि ! देख, दो अति सुन्दर सांवले-गोरे पथिक जा रहे हैं। मार्गमें उनके साथ एक अति सुन्दरी और सलोनी स्त्री भी शोभायमान है ॥ १ ॥ ये शोभारूप समुद्रके सुन्दर रत्नके समान हैं; इस समय माता-पिताके दुर्भाग्यवश फन्देमें पड़ गये हैं ॥ २ ॥ इनके चरण कमलके समान कोमल हैं, परन्तु उनमें जूतियाँ भी नहीं हैं। इन्होंने अपने रूपकी मोहनी डालकर सारे स्थावर, जङ्गम प्राणियोंको मोहित कर लिया है ॥ ३ ॥ ये मुनिवेष धारण किये हैं और इनके पास धनुष-बाण भी हैं।' इनके सुन्दर-सुन्दर डग तुलसीदासके हृदय में विराजमान हैं ॥ ४ ॥ [ २८ ] पथिक पयादे जात पंकज-से पाय हैं। मारग कठिन, कुस-कंटक-निकाय हैं॥ १॥ सखी ! भूखे-प्यासे, पै चलत चित चाय हैं। इन्हके सुकृत सुर-संकर सहाय हैं॥ २॥ रूप-सोभा-प्रेमके-से कमनीय काय हैं। मुनिबेष किये किधों ब्रह्म-जीव-माय हैं॥ ३॥ बीर, बरियार, धीर, धनुधर-राय हैं। दसचारि-पुर-पाल आली उरगाँये हैं॥ ४॥
गीतावली २०० मग-लोग देखत करत हाय हाय हैं। बन इनको तो बाम बिधि के बनाय हैं ॥ ५ ॥ धन्य ते, जे मीन-से अवधि अंबु-आय हैं। तुलसी प्रभुसों जिन्हहुँके भले भाय हैं ॥ ६ ॥ हाय ! ये पथिक अपने कमलसदृश चरणोंसे पैरों ही चल रहे हैं। मार्ग बड़ा ही कठोर है तथा उसमें कुश और कण्टकोंका समूह भरा हुआ है ॥ १ ॥ हे सखि ! फिर भी ये भूखे-प्यासे बड़े चावसे चले जा-रहे हैं। मालूम होता है, इनके पुण्यबलसे देवता और महादेवजी इनके सहायक हैं ॥२॥ ये मानो रूप, शोभा और प्रेमकी मनोहर मूर्तियाँ ही हैं अथवा मुनिवेष धारण किये ब्रह्म, माया और जीव ही विराजमान हैं ॥ ३ ॥ ये वीर, बलवान्, धैर्यवान् और धनुर्धरोंमें अग्रगण्य हैं अथवा चौदहों भुवनोंकी रक्षा करनेवाले महा- कीर्तिशाली हरि ही हैं ॥ ४ ॥ मार्गके लोग देखकर 'हाय ! हाय ! !' करते हैं और कहते हैं कि 'इन्हें जो वनवास हुआ है सो विधाता इनके लिये बहुत ही टेढ़ा जान पड़ता है' ॥ ५ ॥ जिन लोगोंकी आयु इनके लौटनेकी अवधिरूप जलमें मीनके समान हो रही है वे धन्य हैं। तुलसीदास कहते हैं, जिनका प्रभुमें सद्भाव है वे लोग भी धन्य हैं ॥ ६ ॥ राग आसावरी [ २९ ] सजनी ! हैं कोउ राजकुमार । पंथ चलत मृदु पद-कमलनि दोउ सील-रूप-आगार ॥ १ ॥ आगे राजिवनैन स्याम-तनु, सोभा अमित अपार । डारौं वारि अंग-अंगनपर कोटि-कोटि सत मार ॥ २ ॥
२०१ अयोध्याकाण्ड पाछें गौर किसोर मनोहर लोचन-बदन उदार । कटि तूनीर कसे, कर सर-धनु, चले हरन छिति-भार ॥ ३ ॥ जुगुल बीच सुकुमारि नारि इक राजति बिनहि सिंगार । इंद्रनील, हाटक, मुकुतामनि जनु पहिरे महि हार ॥ ४ ॥ अवलोकहु भरि नैन, बिकल जनि होहु, करहु सुबिचार । पुनि कहँ यह सोभा, कहँ लोचन, देह-गेह-संसार ? ॥ ५ ॥ सुनि प्रिय-बचन चितै हित कै रघुनाथ कृपा-सुखसार । तुलसिदास प्रभु हरे सबन्हिके मन, तन रही न सँभार ॥ ६ ॥ अरी सजनी ! ये कोई राजकुमार हैं। यह दोनों ही शील और रूपके भण्डार हैं तथा मार्गमें मृदुल चरणकमलोंसे पैदल ही चल रहे हैं ॥ १ ॥ आगे तौ कमलनयन और श्याम शरीरवाले कुँवर हैं, जिनकी शोभा अतुलित और अपार है। उनके एक-एक अङ्गपर मैं सैकड़ों-करोड़ कामदेव निछावर करती हूँ ॥ २ ॥ और पीछे गौरवर्ण मनोहर किशोरावस्थावाले लाल हैं। उनके नेत्र और मुख भी बड़े ही सुन्दर हैं। वे कमरमें तरकस और हाथोंमें धनुष-बाण लेकर मानों पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही जा रहे हैं ॥ ३ ॥ दोनोंके बीचमें एक सुकुमारी नारी बिना ही शृङ्गार किये विराज रही है। ये तीनों मिलकर ऐसे जान पड़ते हैं मानों पृथ्वी इन्द्रनील, सुवर्ण और मुक्ता मणिका हार पहने हुए हों ॥ ४ ॥ इन्हें तनिक नेत्र भरकर देख लो, व्याकुल मत होओ, तनिक विचार लो—'फिर कहां यह शोभा मिलेगी ?' कहाँ हमारे नेत्र होंगे और कहाँ इस संसारमें ये घर और शरीर रहेंगे ?' ॥ ५ ॥ ये प्रिय वचन सुनकर कृपा और सुखके सारस्वरूप भगवान् रामने उनकी ओर प्रीतिपूर्वक देखा । तुलसीदास
गीतावली २०२ कहते हैं, ऐसा करके प्रभुने उनके चित्त चुरा लिये और उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि न रही ॥ ६ ॥ [ ३० ] देखु री सखी ! पथिक नख-सीख नीके हैं। नीले पीले कमल-से कोमल कलेवरनि, तापस हू बेष किये काम कोटि फीके हैं ॥ १ ॥ सुकृत-सनेह-सील-सुषमा-सुख सकेलि, बिरचे बिरंचि किधौं अमिय, अमीके हैं। रूपकी-सी दामिनी सुभामिनी सोहति संग, उमहु रमातें आछे अंग अंग ती के हैं ॥ २ ॥ बन-पट कसे कटि, तून-तीर-धनु धरे, धीर, बीर, पालक कृपालु सबहीके हैं। पानही न, चरन-सरोजनि चलत मग, कानन पठाए पितु-मातु कैसे ही के हैं ॥ ३ ॥ आली अवलोकि लेहु, नयननिके फल येहु, लाभके सुलाभ, सुखजीवन-से जी के हैं। धन्य नर-नारि जे निहारि बिनु गाहक हू, अपने अपने मन मोल बिनु बीके हैं ॥ ४ ॥ बिबुध बरखि फूल हरषि हिये कहत, ग्राम-लोग मगन सनेह सीय-पी के हैं। जोगीजन-अगम दरस पायो पाँवरनि, प्रमुदित मन सुनि सुरप-सची के हैं ॥ ५ ॥ प्रीतिके सुबालक-से लालत सुजन मुनि, मग चारु चरित लषन-राम-सी के हैं। जोग न बिराग-जाग, तप न तीरथ-त्याग, एही अनुराग भाग खुले तुलसी के हैं ॥ ६ ॥
अरी सखि ! देख, ये पथिक तो नखसे सिखतक सुन्दर हैं। ये अपने नीले और पीले कमलोंमें समान कोमल शरीरोंसे तापस वेश बनाये रहनेपर भी करोड़ों कामदेवोंको फीकाकर रहे हैं ॥ १ ॥ कहीं विधाताने सुकृत, स्नेह, शील, सुषमा और सुख—इन सबको एकत्र करके तो इन्हें नहीं रचा है ? ये तो अमृतके भी अमृत हैं। इनके साथ रूपमें विद्युत्के समान एक स्त्री शोभायमान है, उसके प्रत्येक अङ्ग उमा और रमासे भी उत्कृष्ट हैं ॥ २ ॥ कमरमें ये वनवासियोके-से वस्त्र पहने तथा तरकस,'तीर और धनुष धारण किये हैं। ये बड़े ही धीर-वीर, कृपालु और सभीका पालन करने- वाले हैं। इनके चरणोंमें जूतियाँ भी नहीं हैं, ये मार्गमें अपने सुकुमार चरणकमलोंसे ही चल रहे हैं। अहो ! इनके माता-पिता न जाने कैसे कठिन हृदयके हैं, जिन्होंने इन्हें वनमें भेज दिया है ॥ ३ ॥ अरी आली ! अच्छी तरह देख लो, यही तो नेत्रोंका फल है। यह लाभका भी लाभ है और चित्तका सुखमय जीवन-सा है। वे नर-नारी धन्य हैं जो इन्हें देखकर बिना ग्राहक ही इनके हाथ अपने-आप बेमोल बिक गये हैं ॥ ४ ॥ देवतालोग फूल बरसाकर हृदयमें हर्षित हो कहते हैं, देखो, ये गाँवके लोग श्रीसीतापतिके स्नेहमें मग्न हो रहे हैं। जिसका मिलन योगियोंको भी कठिन है, इन बेचारे पामर प्राणियोंने उन्हीं प्रभुका दर्शन प्राप्त किया, प्रभुका वनगमन सुनकर इन्द्र और शचीका चित्त भी परम आनन्दित हो रहा है ॥ ५ ॥ मार्गमें राम, लक्ष्मण और सीताके जो पवित्र चरित्र होते हैं वे प्रीतिके बालकोंके समान हैं, जिन्हें सुजन मुनिजन (पिताके समान) लालन करते हैं। योग, वैराग्य, यज्ञ, तप, तीर्थ
गीतावली २०४ और त्याग आदिका अभाव होनेपर भी इसी अनुरागके कारण तुलसी दासके भी भाग्य खुल गये हैं॥ ६॥ [ ३१ ] रीति चलिबेकी चाहि, प्रीति पहिचानिकै। आपनी आपनी कहैं, प्रेम-परबस अहैं, मंजु मृदु बचन सनेह-सुधा सानिकै ॥ १ ॥ साँवरे कुँवरके बराइकै चरनके चिह्न, बधू पग धरति कहा धौं जिय जानिकै। जुगल कमल-पद-अंक जोगवत जात, गोरे गात कुँवर महिमा महा मानिकै ॥ २ ॥ उनकी कहनि नीकी, रहनि लषन-सी की, तिनकी गहनि जे पथिक उर आनिकै। लोचन सजल, तन पुलक, मगन मन, होत भूरिभागी जस तुलसी बखानिकै ॥ ३ ॥ ग्रामके नर-नारी राम, लक्ष्मण और सीताजीके चलनेकी रीति देखकर और उनकी प्रीति पहचानकर, प्रेमके वशीभूति हो, स्नेह- सुधामें डुबोकर अपनी-अपनी बुद्धिसे ये मनोहर और मृदुल वचन कह रहे हैं ॥ १ ॥ 'देखो, यह बहू न जाने क्या समझकर साँवले कुँवरके चरण-चिह्नोंको बचाकर पाँव रखती है और गोरे शरीरवाले कुँवर मनमें अत्यन्त महिमा मानकर दोनोंहीके चरणकमलोंके चिन्होंको सँभालते हुए चलते हैं' ॥ २ ॥ उन ग्राम्यपुरुषोंका कथन अच्छा है, सीता और लक्ष्मणका रहन-सहन अच्छा है, तथा जो उन पथिकोंको हृदयमें धारण कर सजल नयन, पुलकित शरीर