भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

१६१ बालकाण्ड इस प्रकार माता कौसल्या स्नेहसे आतुर और दुःखित होकर कहने लगीं—"अरी सखि ! सुन, संसारमें वीर पुरुषकी माताका जीवन तो वृथा ही है और क्षत्रिय-जातिकी गति भी बड़ी ही विकट है ॥ ३ ॥ जो पुरुष मुझसे यह कहेगा कि 'राम और लक्ष्मण मुनिके यज्ञकी रक्षा कर घर लौट आये हैं' वह स्वभावसे ही मुझे वैसा ही प्रिय लगेगा जैसे चारों पुत्र" ॥ ४ ॥ [ १०१ ] जबतें लै मुनि संग सिधाए। राम लखनके समाचार, सखि ! तबतें कछूअ न पाए ॥ १ ॥ बिनु पानही गमन, फल भोजन, भूमि सयन तरुछाहीं। सर-सरिता जलपान, सिसुनके संग सुसेवक नाहीं ॥ २ ॥ कौसिक परम कृपालु, परमहित समरथ, सुखद, सुचाली। बालक सुठि सुकुमार सकोची, समुझि सोच मोहि आलीं ॥ ३ ॥ बचन सप्रेम सुमित्राके सुनि सब सनेह-बस रानी। तुलसी आइ भरत तेहि औसर कही सुमंगल बानी ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! जबसे मुनीश्वर अपने साथ लेकर गये हैं तबसे मुझे राम-लक्ष्मणका कुछ भी समाचार नहीं मिला ॥ १ ॥ उन्हें बिना जूतियोंके चलना, फलाहार करना, वृक्षकी छायामें पृथ्वीपर सोना और नदी एवं तालाबोंका जल पीना पड़ेगा । उन बालकोंके साथ कोई अच्छा सेवक भी नहीं है ॥ २ ॥ विश्वामित्रजी तो बड़े कृपालु, परमहितकारी, सामर्थ्यवान्, सुखदायक और सदाचारी हैं, परन्तु ये शुद्धचित्त बालक भी बड़े ही सुकुमार और संकोच करनेवाले हैं—अरी आली ! यह जानकर ही मुझे बड़ा सोच हो रहा गी० ११—