भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

गीतावली १६२ हैं' ॥ ३ ॥ सुमित्राके ये प्रेमपूर्ण वचन सुनकर सब रानियाँ स्नेहवश हो गयीं। तुलसीदास कहते हैं, इसी समय भरतजीने आकर मङ्गलमय वचन सुनाये ॥ ४ ॥ [ १०२ ] सानुज भरत भवन उठि धाए। पितु-समीप सब समाचार सुनि, मुदित मातु पहँ आए ॥ १ ॥ सजल नयन, तनु पुलक, अधर फरकन लखि प्रीति सुहाई । कौसल्या लिये लाइ हृदय, ‘बलि कहौ, कछु है सुधि पाई ?॥ २ ॥ सतानंद उपरोहित अपने तिरहुति-नाथ पठाए। खेम कुसल रघुबीर-लषनकी ललित पत्रिका ल्याए ॥ ३ ॥ दलि ताड़का, मारि निसिचर, मख राखि, बिप्र-तिय तारी। दै बिद्या लै गये जनकपुर, हैं गुरु-संग सुखारी ॥ ४ ॥ करि पिनाक पन, सुता स्वयंबर सजि, नृप कटक बटोरयो। राजसभा रघुबीर मृनाल ज्यों संभु सरासन तोरयो ॥ ५ ॥ यों कहि सिथिल सनेह बंधु दोउ, अंब अंक भरि लीन्हें। बार बार मुख चूमि, चारु मनि-बसन निछावरि कीन्हें ॥ ६ ॥ सुनत सुहावनि चाह अवध घर घर आनंद बधाई। तुलसिदास रनिवास रहस-बस सखी सुमंगल गाई ॥ ७ ॥ भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजी उठकर राजभवनको दौड़ आये। वे पिताजीके पास सारे समाचार सुन, प्रसन्न