गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १६० कलेवा निकाल कर देगा और कौन आभूषण पहनाकर निछावर करते हुए नेत्रोंका आनन्द लूटेगा ! ॥ २ ॥ जिन्हें पिता, परिजन और माताएँ सर्वदा नेत्रोंकी पलकोंके समान सँभाल रखती थीं, उन्हें राजाने यज्ञकी रखवाली और निशाचरोंका संहार करनेके लिये विश्वामित्रजीके साथ भेज दिया ! ॥ ३ ॥ हे विधाता ! क्या कभी वह दिन आवेगा जब मैं उन अति सुन्दर, सलोने, सुकुमार, सुकोमल और काकपक्षधारी दोनों बालकोंको देखकर हर्षित हो हृदयसे लगाऊँगी ?' ॥ ४ ॥ [ १०० ] ऋषि नृप-सीस ठगौरी-सी डारी । कुलगुर, सचिव, निपुन नेवनि अवरेब न समुझि सुधारी ॥ १ ॥ सिरिस-सुमन-सुकुमार कुँवर दोउ, सूर सरोष सुरारी । पठए बिनहि सहाय पयादेहि केलि-बान-धनुधारी ॥ २ ॥ अति सनेह-कातरि माता कहै, सुनि सखि ! बचन दुखारी । बादि बीर-जननी-जीवन जग, छत्रि-जाति-गति भारी ॥ ३ ॥ जो कहिहै फिरे राम-लषन घर करि मुनिमख-रखवारी । सो तुलसी प्रिय मोहिं लागिहै ज्यौं सुभाय सुत चारी ॥ ४ ॥ 'ऋषिवर विश्वामित्रजीने तो राजाके मस्तकपर कुछ जादू-सा कर दिया । इस विपरीत स्थितिका कुलगुरु, मन्त्री और निपुण नायकोंने भी बुद्धिपूर्वक सुधार नहीं किया ! ॥ १ ॥ देखो, दोनों कुमार तो सिरसके फूलके समान सुकुमार हैं और राक्षसलोग बड़े शूरवीर तथा क्रोधी हैं । फिर भी क्रीडाके धनुष-बाण लिये उन्हें बिना किसी प्रकारकी सहायताके पैदल ही भेज दिया' ॥ २ ॥