गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६५ बालकाण्ड पत्नीरूपसे स्त्रीरत्न सीताको प्राप्त किया' ॥ ४ ॥ यह सुहावना समाचार सुनकर नगरमें घर-घर परम आनन्द हो रहा है। माताएँ प्रसन्न होकर मङ्गलके साज सजाती हैं और कहती हैं—'माई ! मुनीश्वरकी कृपासे ही ये सारे सुमङ्गल हुए हैं, ॥ ५ ॥ फिर गुरुजीकी आज्ञा पा, सब प्रकारकी सामग्रियोंसे सजाकर मण्डप रचा गया। तुलसीदासजी कहते हैं—इस प्रकार महाराज दशरथ बरात सजाकर गणेशजीका पूजनकर निसान बजाते हुए चले ॥ ६ ॥ राग केदारा [ १०४ ] मनमें मंजु मनोरथ हो, री ! सोहर-गौरि-प्रसाद एकतें, कौसिक, कृपा चौगुनो भो, री ! ॥ १ ॥ पन-परिताप, चाप-चिंता-निसि, सोच-सकोच-तिमिर नहिं थोरी। रबिकुल-रबि अवलोकि सभा-सर हितचित-बारिज-बन बिकसोरी ॥ २ ॥ कुँवर-कुँवरि सब मंगल मूरति, नृप दोउ धरमधुरंधर-धोरी। राजसमाज भूरिभागी, जिन लोचन लाहु लह्यो एक ठौरी ॥ ३ ॥ ब्याह-उछाह राम-सीताको सुकृत सकेलि बिरंचि रच्यो, री। तुलसिदास जानै सोइ यह सुख, जेहि उर बसति मनोहर जोरी ॥ ३ ॥ [बरात देखकर जनकपुरकी स्त्रियाँ कहने लगीं—] अरी सखि ! हमारे मनमें जो एक मनोहर मनोरथ था वह श्रीशङ्कर और पार्वतीजीके प्रसादसे तथा विश्वामित्रजीकी कृपासे चौगुना हो गया ॥ १ ॥ प्रणके पश्चात्ताप और चापरूप चिन्ताकी रात्रिमें [ धनुष न टूटनेका ] सोच और [ प्रण छोड़नेका ] संकोचरूप अन्धकार कुछ कम नहीं था; किन्तु सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रको