गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १.६४ पन पिनाक, पबि मेरु तें गुरुता कठिनाई । लोकपाल, महिपाल, बान बानइत, दसानन सके न चाप चढ़ाई ॥ ३ ॥ तेहि समाज रघुराजके मृगराज जगाई । भंजि सरासन संभुको जग जय, कल कीरति, तिय तियमनि सिय पाई ॥ ४ ॥ पुर घर घर श्रानंद महा सुनि चाह सुहाई । मातु मुदित मंगल सजें, कहैं मुनि प्रसाद भये सकल सुमंगल, माई ॥ ५ ॥ गुरु-आयसु मंडप रच्यो, सब साज सजाई । तुलसिदास दसरथ बरात सजि, पूजि गनेसहि चले निसान बजाई ॥ ६ ॥ [अयोध्यावासी नर-नारी आपसमें कहने लगे—] 'आज राम-लक्ष्मणका समाचार मिला है, इसीसे अयोध्यामें बधाई बज रही है। महाराज जनकने सुन्दर लग्नपत्रिका लिखकर अपने पुरोहितके हाथ भेजी है ॥ १ ॥ महाराज विदेहके रूपमें बढ़ी-चढ़ी एक कन्या है। उसके स्वयंवरका समाचार सुन देश-देशान्तरके नृपतिगण अपनी-अपनी चतुरङ्गिणी सेनाएँ सजाकर आये थे ॥ २ ॥ उस स्वयंवरका प्रण महादेवजीका धनुष था, जिसकी गुरुता और कठोरता वज्र एवं मेरुसे अधिक थी । उस धनुषको लोकपाल, अन्य महिपाल तथा धनुर्विद्यामें निपुण बाणासुर एवं रावणादि भी नहीं चढ़ा सके ॥ ३ ॥ उस समाजमें [महाराज जनकने कुछ कटु वचन कहकर] रामरूप मृगराज (सिंह) को जगा दिया । उन्होंने महादेवजीका धनुष तोड़कर संसारमें विजय, कमनीय कीर्ति और