गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १६६ देखते ही इस राजसभारूप सरोवरमें सुहृज्जनोंके चित्तरूप कमलोंका वन विकसित हो गया है॥२॥ राम आदि राजकुमार और जानकी आदि कुमारियाँ ये सभी मङ्गलकी मूर्ति हैं और दोनों महाराज भी धर्मधुरन्धरोंमें धुरीण हैं। यह राज-समाज भी बड़भागी है, जिसने नेत्रोंका यह लाभ एक ही स्थानपर प्राप्त कर लिया ॥ ३॥ राम सीताके विवाहका यह उत्साह विधाताने सारे सुकृतोंको एकत्र करके रचा है। तुलसीदासजी कहते हैं, इस सुखको वही जान सकता है जिसके हृदयमें यह मनोहर जोड़ी विराजमान रही है॥४॥ [ १०५ ] राजति राम-जानकी-जोरी। स्याम-सरोज जलद सुंदर बर, दुलहिनि तड़ित-बरन तनु गोरी ॥ १ ॥ ब्याह समय सोहति बितानतर, उपमा कहुँ न लहति मति मोरी। मनहुँ मदन मंजुल मंडपमहँ छबि-सिंगार-सोभा इक ठौरी ॥ २॥ मंगलमय दोउ, अंग मनोहर, ग्रथित चूनरी पीत पिछोरी। कनककलस कहँ देत भाँवरी, निरखि रूप सारद भइ भोरी ॥ ३ ॥ इत बसिष्ठ मुनि, उतहि सतानँद, बंस बखान करें दोउ ओरी। इत अवधेस, उतहि मिथिलापति, भरत अंक सुख सिंधु हिलोरी ॥ ४ ॥ मुदित जनक, रनिवास रहसबस, चतुर नारि चितवहिं तृन तोरी। गान-निसान बेद धुनि सुनि सुर बरसत सुमन, हरष कहै कोरी ॥ ५॥ नयननको फल पाइ प्रेमबस सकल असीसत ईस निहोरी। तुलसी जेहि आनंदमगन मन, क्यों रसना बरनै सुख सोरी ॥ ६ ॥ राम और जानकीकी जोड़ी विराजमान है। वर नीलकमल एवं श्याममेघके समान सुन्दर है तथा दुलहिन बिजलीके समान गोरे