गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १५८ देती है ॥ २ ॥ इन्हें हार्दिक प्रेमसहित देख । नखसे शिखापर्यन्त इनका प्रत्येक अङ्ग यथायोग्य रूपसे सुशोभित है । इन्हें देखकर अपने पुण्य, सीतारामके रूप तथा [इन मूर्तियोंको रचनेवाले] विधाताकी बुद्धिकी सराहना कर ॥ ३ ॥ प्रसन्न मनके कारण सुन्दर मुखमण्डलकी शोभापर और भी अधिक उत्साह उदित हो रहा है, मानो चन्द्रमाने अपना कलङ्क दूर कर युद्धमें राहुको मार डाला हो ॥ ४ ॥ इनके सुषमासदन नयन कमलकी भी सुन्दरताको हर लेते हैं । ऐसे ये जानकीपति तुलसीदासके हृदयरूप पुरमें विराजते हैं ॥ ५ ॥ राग सारङ्ग [ ९८ ] भूपके भागकी अधिकाई । टूट्यौ धनुष, मनोरथ पूज्यौ, बिधि सब बात बनाई ॥ १ ॥ तबतें दिन-दिन उदय जनकको जबतें जानकी जाई । अब यहि ब्याह सफल भयो जीवन, त्रिभुवन बिदित बड़ाई ॥ २ ॥ बारहि बार पहुनई ऐहैं राम लषन दोउ भाई । एहि आनंद मगन पुरबासिन्ह देहदसा बिसराई ॥ ३ ॥ सादर सकल बिलोकत रामहि, काम-कोटि छबि छाई । यह सुख समउ समाज एक मुख क्यों तुलसी कहै गाई ॥ ४ ॥ [कोई सखी कहती है—] 'यह महाराज जनकके भाग्यकी अधिकता ही है कि धनुष टूट गया, मनोरथ पूर्ण हो गया और विधाताने सारी बात बना दी ॥ १ ॥ जबसे जानकीका जन्म हुआ है तबसे जनकजीकी दिनोंदिन उन्नति हो रही है । अब इसका