भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 164

गीतावली १५८ देती है ॥ २ ॥ इन्हें हार्दिक प्रेमसहित देख । नखसे शिखापर्यन्त इनका प्रत्येक अङ्ग यथायोग्य रूपसे सुशोभित है । इन्हें देखकर अपने पुण्य, सीतारामके रूप तथा [इन मूर्तियोंको रचनेवाले] विधाताकी बुद्धिकी सराहना कर ॥ ३ ॥ प्रसन्न मनके कारण सुन्दर मुखमण्डलकी शोभापर और भी अधिक उत्साह उदित हो रहा है, मानो चन्द्रमाने अपना कलङ्क दूर कर युद्धमें राहुको मार डाला हो ॥ ४ ॥ इनके सुषमासदन नयन कमलकी भी सुन्दरताको हर लेते हैं । ऐसे ये जानकीपति तुलसीदासके हृदयरूप पुरमें विराजते हैं ॥ ५ ॥ राग सारङ्ग [ ९८ ] भूपके भागकी अधिकाई । टूट्यौ धनुष, मनोरथ पूज्यौ, बिधि सब बात बनाई ॥ १ ॥ तबतें दिन-दिन उदय जनकको जबतें जानकी जाई । अब यहि ब्याह सफल भयो जीवन, त्रिभुवन बिदित बड़ाई ॥ २ ॥ बारहि बार पहुनई ऐहैं राम लषन दोउ भाई । एहि आनंद मगन पुरबासिन्ह देहदसा बिसराई ॥ ३ ॥ सादर सकल बिलोकत रामहि, काम-कोटि छबि छाई । यह सुख समउ समाज एक मुख क्यों तुलसी कहै गाई ॥ ४ ॥ [कोई सखी कहती है—] 'यह महाराज जनकके भाग्यकी अधिकता ही है कि धनुष टूट गया, मनोरथ पूर्ण हो गया और विधाताने सारी बात बना दी ॥ १ ॥ जबसे जानकीका जन्म हुआ है तबसे जनकजीकी दिनोंदिन उन्नति हो रही है । अब इसका

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक) · पृष्ठ 164, कुल 454 में से · BharatKosha