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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

३३ बालकाण्ड उन्होंने बलिदान एवं पूजाकी सामग्री और मूलिकामणि आदि लाकर सजा रक्खी हैं । जिन देवताओं और देवियोंका अपने हितके लिये हृदयसे आदरपूर्वक पूजन करते हैं वे सब लोगोंसे परिचय करके उन्हें यन्त्रों-मन्त्रोंका प्रयोग सिखा देते हैं ॥ ४ ॥ सुवासिनी, गुरुजन, पुरजन, पाहुने, सुर-सुन्दरियाँ, देवता, मुनि और याचक—इन सबमें जो जिनकी योग्य हैं—जिनकी जैसी योग्यता है, महाराजने उन्हें वैसी ही पहरावनी देकर पूर्णकाम किया है और वे भी जय-जयकार करते हुए उन्हें आशीर्वाद देते हैं तथा तुलसीदास- जीके समान ही हृदयमें आनन्द मानते हैं । 'जिस प्रकार आज हुआ है उसी प्रकार कल और परसों भी जागरण होगा' ऐसा कहकर न्योता दिया गया है। वे लोग धन्य एवं पुण्यनिधि हैं जो उस समय आनन्दमय जीवन पाकर जी रहे थे ॥ ५ ॥ बड़े-बड़े देवता और नागगण भी महाराजके सौभाग्यकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्न होते हैं। सुन्दरी स्त्रीके रूपमें लक्ष्मीजी और सखीरूपसे अणिमादिक सिद्धियाँ उनकी परिचर्या करती हैं। अणिमादि सिद्धियाँ, शारदा और पार्वतीजी उन बालकोंका लालन-पालन करती हैं। पार्वती और लक्ष्मीजीको जो सुख सारे जन्ममें नहीं मिला वह इस समय प्राप्त हुआ है* । लोकपालगण अपने लोकोंको भूल गये । वे अपने घरोंकी चर्चा भी नहीं चलाते । तुलसीदासजी कहते हैं कि तीनों तापोंसे तपे हुए लोकको मानो प्रभुकी छठीरूप छाया प्राप्त हो गयी है ॥ ६ ॥ *क्योंकि यहाँ भगवान् उन्हें बालरूपसे प्राप्त हुए हैं । गी० ५—

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