भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली ३२ निशानाथ प्रकाशमान हैं और दसों दिशाओंमें तारामण्डल जगमगा रहा है, आनन्दकी बाढ़ आ रही है। आज आनन्द उमड़ रहा है। देवतालोग अनेक विमान सजाकर गाते, बजाते, नाचते और प्रसन्न होते हैं तथा आकाशमें आ-आकर फूलोंकी वर्षा करते हैं। पुरवासी आकाशकी ओर देखकर और देवगण नगरकी शोभानिहारकर परस्पर सुखी होते हैं और जी भरकर रघुराज (दशरथ) के साज-सामानकी सराहना करते तथा नेत्रोंका लाभ लूटते हैं ॥२॥ [उधर अन्तःपुरमें सखियोंमें बात हो रही है कि] अरी सखि ! आज रामजीकी छठी है। आज रातभर जागना चाहिये [ छठीके दिन पूतना आदिके आक्रमणका भय होता है। इससे लोग रातभर जागते रहते हैं ] । आजकी रात्रिको, रामकी छठीकी रात होनेसे, तू सुन्दर समझ । चारों राजकुमार क्या हैं, मानो मङ्गल और मोदसे मढ़ी हुई मूर्तियाँ ही विराज रही हैं। विधाताने चार अति मनोहर परमार्थमयी मूर्तियाँ रची हैं और उनकी पूजाके लिये दशरथजीको उपयुक्त समझ उन्हींको ब्रह्मा और शिव दोनोंने मिलकर वे मूर्तियाँ सौंप दी हैं। महाराजके मञ्जुल भवनमें आज उन्हींकी छठी है, जिनके आनन्दसे सम्पूर्ण जगत् आनन्दित हो रहा है। इस समय निद्रारूप स्त्रीने भी जागरण किया है, इसलिये रात्रि बड़ी सुहावनी जान पड़ती है ॥३॥ सेवक और सुजान् सचिवगण भी समयको साधनेके लिये सावधान ही गये हैं [ जिससे कि निर्दिष्ट समयपर मन्त्र-तन्त्रका प्रयोग कर सकें ] क्योंकि गुरुवर वसिष्ठ मुनिने उन्हें सब प्रकारके लौकिक और वैदिक विधानोंका आदेश दिया है। इस समय अनेक वैदिक और लौकिक विधानोंका, जिन्हें उन्होंने सुन रखा है, समझकर व्यवहार कर रहे हैं।