गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१ बालकाण्ड बैदिक बिधान अनेक लौकिक आचरत सुनि जानिकै । बलिदान-पूजा मूलिकामनि साधि राखी आनिकै ॥ जे देव देवी सेइयत हित लागि चित सनमानिकै । ते जन्त्र-मन्त्र सिखाइ राखत सबनिसों पहिचानिकै ॥ ४ ॥ सकल सुआसिनि, गुरजन, पुरजन, पाहुन लोग। बिबुध-बिलासिनि, सुर-मुनि, जाचक, जो जेहि जोग ॥ जेहि जोग जे तेहि भाँति ते पहिराइ परिपूरन किये। जय कहत, देत असीस, तुलसीदास ज्यों हुलसत हिये ॥ ज्यों आजु कालिहु परहुँ जागन होहिँगे, नेवते दिये। ते धन्य पुन्य पयोधि जे तेहि समै सुख-जीवन जिये ॥ ५ ॥ भूपति-भाग बली सुर-बर नाग सराहि सिहाहिँ । तिय बरबेष अली रमा सिधि अनिमादि कमाहिँ ॥ अनिमादि, सादर, सैलनंदिनि बाल लालहि पालहीं । भरि जनम जे पाए न, ते परितोष उमा-रमा लहीं ॥ निज लोक बिसरे लोकपति, घरकी न चरचा चालहीं । तुलसी तपत तिहु ताप जग, जनु प्रभुछठी-छाया लही ॥ ६ ॥ अवधमें घर-घर बधावा हो रहा है; मङ्गलका साज सज रहा है। सुहावने शकुन हो रहे हैं, और सब लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने कार्योंमें जुटे हुए हैं, नगरके नर और नारी अपने-अपने कार्य सँभाल- कर सजाते और अगणित रचनाएँ करते हैं। घर, आंगन, अटारी, बाजार और गलियोंमें अनेक प्रकारसे सुन्दर चौक पूरे गये हैं। चँवर, पताका, मण्डप, कलश और दीपावलीसे सजी हुई, सुख, सुकृत और शोभामयी अयोध्यापुरीको मानो विधाताकी सुमतिरूप जननीने उत्पन्न किया है ॥१॥ आज चैत्र शुक्ला चतुर्दशीके दिन, जबकि निर्मल