भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली ३० आविर्भावका उत्साह और उमङ्ग बढ़ रहे हैं तथा घर-घरमें अवधकी ही कहानी सुनायी देती है। तुलसीदास भी उस समाजको हृदयमें धारणकर रामजन्मका यश गान करता है ॥ १४ ॥ राग केदारा [ ५ ] घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज। सगुन सोहावने मुदित मन कर सब निज-निज काज ॥ निज काज सजत सँवारि पुर-नर-नारि रचना अनगनी। गृह, अजिर, अटनि, बजार, बीथिन्ह चारु चौकें बिधि घनी ॥ चामर, पताक, बितान, तोरन, कलस, दीपावलि बनी। सुख-सुकृत-सोभामय पुरी बिधि सुमति जननी जनु जनी ॥ १ ॥ चैत चतुरदसि चाँदनी, अमल उदित निसिराज। उडुगन अवलि प्रकाशहीं उमगत आनँद आज ॥ आनँद उमगत आजु, बिबुध बिमान बिपुल बनाइकै। गावत, बजावत, नटत, हरषत, सुमन बरसत आइकै ॥ नर निरखि नभ, सुर पेखि पुरछबि परस्पर सचु पाइकै। रघुराज-साज सराहि लोचन-लाहु लेत अघाइकै ॥ २ ॥ जागिय राम छठी सजनि रजनी रुचिर निहारि। मङ्गल मोदमढ़ी मूरति नृपके बालक चारि ॥ मूरति मनोहर चारि बिरचि बिरञ्चि परमारथमई। अनुरूप भूपति जानि पूजन-जोग बिधि सङ्कर दई ॥ तिन्हकी छठी मञ्जुलमठी, जग सरस जिन्हकी सरसई। किए नींद-भामिनि जागरण, अभिरामिनी जामिनि भई ॥ ३ ॥ सेवक सजग भए समय-साधन सचिव सुजान। मुनिवर सिखये लौकिकौ बैदिक बिबिध बिधान ॥