गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५ बालकाण्ड
सुनत सुआसिनि लै चलीं गावत बड़भागीं। उमा-रमा, सारद-सची लखि सुनि अनुरागीं ॥ १२ ॥ निज-निज रुचि बेष बिरचिकै हिलि-मिलि सँग लागीं। तेहि अवसर तिहु लोककी सुबसा जनु जागीं ॥ १३ ॥ चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनि सोहैं। गोद मोद-मूरति लिए, सुकृती जन जोहैं ॥ १४ ॥ सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं। सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं? ॥ १५ ॥ लगे पढ़न रच्छा-ऋचा ऋषिराज बिराजे। गगन सुमन-झरि, जय-जय, बहु बाजन बाजे ॥ १६ ॥ भये अमंगल लंकमें, संक-संकट गाजे। भुवन चारिदसके बड़े दुख-दारिद भाजे ॥ १७ ॥ बाल बिलोकि अथरबणी हँसि हरहि जनायो। सुभको सुभ, मोद मोदको, 'राम' नाम सुनायो ॥ १८ ॥ आलबाल कल कौसिला, दल बरन सोहायो। कंद सकल आनंदको जनु अंकुर आयो ॥ १९ ॥ जोहि, जानि, जपि, जोरिकै करपुट सिर राखे। 'जय जय जय करुनानिधे !' सादर सुर भाषे ॥ २० ॥ 'सत्यसंध ! साँचे सदा जे आखर आषे। प्रनतपाल ! पाये सही, जे फल अभिलाषे' ॥ २१ ॥ भूमिदेव देव देखिकै नरदेव सुखारी। बोलि सचिव सेवक सखा पटधारि भंडारी ॥ २२ ॥ देहु जाहि जोइ चाहिए सनमानि सँभारी। लगे देन हिय हरषिकै हेरि-हेरि हँकारी ॥ २३ ॥