गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग ीतावली ४०६ सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले भगवान् रामके मनोहर चरणकमल मानो साक्षात् तीर्थराज होकर विराजमान हैं। श्रीशंकरके हृदयकी भक्तिरूप भूमिपर प्रेममय अक्षयवट शोभायमान है॥ १ ॥ चरणोंका पृष्ठभाग श्यामवर्ण है, तलुए अरुण हैं तथा उसमें शुक्लवर्ण नखावली शोभायमान है, मानो यमुना, सरस्वती और गङ्गाजी—ये तीनों मिलकर सुन्दर त्रिवेणीके रूपमें बह चली हों ॥ २ ॥ तलुओंमें जो अंकुश वज्र, कमल और ध्वजाके चिह्न हैं, वे ही सुन्दर भँवर और तरंगावली हैं। उनमें देवता और साधुजन स्नान करते हैं तथा वे मुनियोंके सुप्रसन्न चित्तोंके मनोहर निवास-स्थान हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके इस चरणरूप प्रयागमें प्रेम करनेसे वैराग्य, जप, यज्ञ, योग, व्रत, तप और शरीरत्यागके बिना ही सब सुख तत्काल सुलभ हो जाते हैं ॥ ४ ॥ राग बिलावल [ १६ ] रघुबर-रूप बिलोकु, मन । सकल लोक-लोचन-सुखदायक, नखसिख सुभग स्यामसुंदर तन । १। चारु चरन-तल-चिह्न चारि फल चारि देत परचारि जाति जन । राजत नख जनु कमल-दलनिपर अरुन-प्रभा-रंजित तुषार-कन । २। जंघा-जानु भानु कदली उर, कटि किंकिनि, पटपीत सुहावन । रुचिर निषंग, नाभि, रोमावलि, त्रिबलि, बलित उपमा कछु आवत ३ भृगुपद-चिह्न, पदक उर सोभित, मुकुतमाल, कुंकुम-अनुलेपन । मनहुँ परसपर मिलि पंकज-रवि प्रगटयौ निज अनुराग, सुजस धन बाहु बिसाल ललित सायक धनु, कर कंकन केयूर महाधन । बिमल दुकूल-दलन दामिनि-दुति, यज्ञोपवीत लसत अति पावन । ५।