गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०५ उत्तरकाण्ड सेवहिं सुचि मुनि-भृंग-बिहग मन-मुदित मनोरथ पाए । सुमिरत हित हुलसत तुलसी अनुराग उमगि गुन गाए ॥ ४ ॥ श्रीरामजीके करकमल भगवान् शंकरका प्रिय करनेवाले कल्पवृक्ष ही हैं। वे सीताजीकी स्नेहरूप ललित लतासे लिपटे हुए तथा लक्ष्मणजीके पुनीत प्रेमरूप सुन्दर बाड़ेसे घिरे हुए हैं ॥ १ ॥ भगवान्का महामनोहर एवं मङ्गलमय शरीर ही उसका मूल है, अंगुलियां मनोहर शाखाएँ हैं, रोमावली पत्ते हैं, नख पुष्प हैं तथा संतपुरुषोंकी इच्छापूर्ति ही उसके सब कालमें फलनेवाले सुफल हैं ॥ २ ॥ उसकी छाया स्थिर, दोषरहित, अनामय (दुखरहित), घनी, अति सुन्दर और छलरहित है। सब प्रकारके दुःख, पाप, रोग, मोह, मान, मद और माया आदिको शान्त करने वाली है ॥ ३ ॥ पवित्रचित्त मुनिजनरूप भौंरे और पक्षी मनमें प्रसन्न होकर अपने मनोरथ सिद्ध करते हुए उसका सेवन करते हैं, उसका स्मरण करनेसे तुलसीदास भी हृदयमें आनन्दित होता है और उसके प्रेममें उमँगकर उसने उसके गुण गाये हैं ॥ ४ ॥ [ १५ ] रामचरन अभिराम कामप्रद तीरथ-राज बिराजै । संकर-हृदय-भगति-भूतलपर प्रेम-अछयबट भ्राजै ॥ १ ॥ स्यामबरन पद-पीठ, अरुन तल, लसति बिसद नखश्रेनी । जनु रबि-सुता सारदा-सुर सरि मिलि चलीं ललित त्रिबेनी ॥ २ ॥ अंकुस-कुलिस-कमल-ध्वज सुंदर भँवर तरंग-बिलासा । मज्जहिं सुर-सज्जन, मुनिजन-मन मुदित मनोहर बासा ॥ ३ ॥ बिनु बिराग-जप-जाग-जोग-ब्रत, बिनु तप, बिनु तनु त्यागे । सब सुख सुलभ सद्य तुलसी प्रभु-पद-प्रयाग अनुरागे ॥ ४ ॥